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Wednesday, June 15, 2011

रुक गए होते

(जून २००९)

शुक्र है खुदा का
अपने कर्मों का हिसाब
दूसरों के एहसानों का क़र्ज़
एक एक कर चुकाना होता है
वरना कब के बिक गए होते

हर रोज़ गुनाहों की दीवार में
एक पत्थर जोड़ते हैं
और एक का हिसाब चुकाते हैं
कुल मिलाकर बोझ
बराबर सा बना रहता है
वरना कब के झुक गए होते

सलीब भारी है
और जीवन कैलाश परिक्रमा
रुकना मना है
खुदा का शुक्र है
सफ़र कदमों में बटा है
वरना कब के थक गए होते

शुक्र है खुदा का
तुम मेरे साथ हो
और रास्ता अनंत है
हर मोड़ से आगे
एक खूबसूरत नज़ारा और भी है
वरना कब के रुक गए होते

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