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Wednesday, June 29, 2011

बस लौट कर आना होता है

(दिसम्बर ३१, २००७; भोपाल शताब्दी एक्सप्रेस)
(पचमढ़ी यात्रा उपरांत)

यह रेलगाड़ी ले जा रही है मुझे
यादों से दूर
मील दर मील पड़ रहे हैं
स्मरण धूमिल

और फिर कभी पलट कर
ले आएगी वापिस
सानिध्य में
उन्ही लम्हों के

वही ठंडी हवा
वही पत्तों पर सोनल रश्मि
वही पगडंडियाँ
वही पड़ाव
वही मंज़िलें

सब यथावत रहता है
बस लौट कर आना होता है  
  

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