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Saturday, January 21, 2012

What C-DOT Silver Jubilee Celebrations mean to me.


(21 July 2009)

Fellows, this, for me if a time for celebration. Unadulterated and uninhibited. I would loathe to burden myself with thoughts about the second coming of the great C-DOT “experiment”, simply because it was fun while it lasted. There was nothing like this before and there will never be. Period.

Time is not continuous. That is, if you care to slice it and keep only the portions with resins on them. On the 27th August (I assume), I would like to inhale the aroma of the still fresh pies with resins on them. This aroma is also known as the “Spirit of C-DOT”, something that exists unchanged, unblemished and imbibed by all C-DOTians. Like it is with all good things that withstand the test to time, fate chooses just the right people. In that sense, we the bearers of the flame, bring the Spirit alive every time we come together. We are “touched by the hand”.

We have all come a long way. Boys to men and giggly girls to ladies proper. Our egos apace.  Everybody is somebody. C-DOT was created from a bunch of nobodies. This time each one of us will have so much to shed prior to the March for we travel light no more. We have been domesticated to work for others. I, therefore, am not losing my sleep over the second coming or the new revolutions we could be part of.

Just show me a barefooted Mao; Aadesh with his ubiquitous spiral notebook; Das’s drawnings; Kohli giving piece of his mind to none other than Meemamsi; Mrs Meemasi’s “aur kaise ho?”; Mr. Lal playing the mouth organ; Mr Mahajan’s fetish for engineering drawings; the holy trinity of Renu-Varsha-Bala; TC’s chain smoking; Leslie’s smile; VYK sandwiches; cricket on Shanthi Path lawns; embassy swimming pools; Das smoking on the balcony; Dani’s curls; the good looking secy’s (never realized HR’s designs of running an in-house jeevansathi.com); Raman’s sore leg after being hit with cricket ball; Saturday Rajma-Rice-Thums up langar from Gulshanji; awe of 901; Swar Parichay; G. Mohan’s savvy; line printer print outs; breakfast in bed during Akbar Hotel days; disco parties; evenings in Rajinder Nagar; Kuldeep’s affection; Ishita’s fiery moments; late night shayari sessions at nukkad; big brother Hari; Nagi’s insights; inseparable Geetha and N. Uma; PK Sridhar and Jasbir’s creativity; Shanky’s handwriting and OHT’s; quizzes on Reception; visiting Kittur in summer; dinners at Queens; Kulfi at Bowering Stall; worldly wisdom of Keni; can’t get angry Mr Meemamsi; Sam’s megawatt smile in that hairstyle!

These are few of my favourite things.

And, I would like to revisit them on this 27th August.

Nothing more. Nothing less!

Wednesday, January 11, 2012

अपना दिल अपने पास, प्यार पक्का! (Part-II of "The Aircraft Theory")

अपना दिल अपने पास, प्यार पक्का!
(Part-II of "The Aircraft Theory")

मैंने "The Aircraft Theory" में लिखा था की दिल अथवा/और रिश्ते टूटने की मुख्य वजहों में से एक है सही वक़्त पर आत्मनियंत्रण न रख पाना. जब हमें धीरे धीरे, सोच समझ कर चलना चाहिए, हम बेलगाम भागते रहते हैं. नतीजा: एक लम्बे समय तक दर्द भरे फ़िल्मी गीत सुनने पड़ते हैं और फसबुक, क्षमा कीजिये, फेसबुक एवं ट्विट्टर पर सहानुभूति-अपेक्षित नुमा सन्देश भेजने पड़ते हैं. लोग खूब मजे ले ले कर खोखली सहानुभूति देते हैं और भगवान से प्रार्थना करते हैं की "हे प्रभु, इस बेचारी को सदैव हमारी सहानुभूति के लायक बनाये रखना!".

मुझे वो दर्दभरा वाकया कभी नहीं भूलता जब मेरे ऑफिस में एक कन्या ने एकाएक हलके रंग के सादा कपड़े पहनने शुरू कर दिए, लिपस्टिक की जगह मात्र वेसलिन, धुले, खुले बाल और पहले से ही थोड़े पीले चेहरे पर कच्छ के मैदानों सा सूनापन. मैंने बहुत डरते हुए (क्या पता बेवड़ी कब "गुमनाम है कोई" जैसा गाना गाना शुरू कर दे और में कच्छ के ज़हरीले मैदानों में भटकने लग जाऊं!) उससे पुछा,
"कोई टेंशन है क्या?"
"नहीं, अब कोई टेंशन नहीं है"
"मतलब, पहले थी क्या?"
"नहीं, पहले भी नहीं थी"
"तो फिर ये सब?" मैंने उसके "संतोषी माता के १६ व्रत" वाले रूप की तरफ इशारा करते हुए कहा.

वो एक वख्वे के बाद बोली, "मुझे लगा तुम्हें तो पता चल ही गया होगा. तुम काफी वेल कनेक्टेड हो"
मुझे एकदम अपने वेल कनेक्टेड न होने का एहसास हुआ पर मैंने तुरंत अपनी झेंप छुपाकर पलट वार किया, "देखो, तुम ऐसी वैसी लड़की नहीं हो, जिसके बारे में कैंटीन वाले राजू को भी पता हो". "अब अगर तुम कहो तो मैं तुम्हारे लिए एक और टी बैग वाली चाय लाऊं?"
हालांकि मुझे बहुत भूख लगी थी, मैंने डिस्को सैंडविच को आगे उत्तपन्न होने वाली और अधिक अन्तरंग पड़ाव के लिए रिज़र्व  रहने दिया.
उसने टुन्ड्रा पर बहने वाली बर्फीली सांस छोढ़ते हुए कहा "ओके. डबल टी बैग."
मैं यथाशीघ्र एक सिंगल टी बैग और एक डबल टी बैग वाली चाय ले आया.
"अब बताओ, क्या टेंशन है?"
"कोई टेंशन नहीं है" उसने सफ़ेद कपड़े के टेबल क्लोथ को नोचते (ओरिगामी?) हुए कहा. "सच यार, ऐसी कोई बात नहीं है. आई एम आलरेडी अहेड ऑफ़ ईट."
मैंने इसे अच्छी शुरुआत समझा. जो लोग "आलरेडी अहेड ऑफ़ ईट" होते हैं, वो नॉर्मली भूकंप के मलबे के नीचे  दबे हुए पड़े होते हैं. उन्हें स्वयं अथवा मेरे जैसे शुभचिंतको की सहायता से उबरना होता है. मुझे सहसा लगा की मैं दिल्ली फाएर ब्रिगेड का एक जांबाज़ कर्मचारी हूँ और मुझे सब स्टेंडर्ड बिल्डिंग के मलबे मैं दबी हुई एक नारी दीख रही है. मेरे पास किन्कर्तव्यविमुढ होने का समय नहीं था. धरमवीर भारती जी की कर्मशाला में लोहा गरम था. सफ़ेद टेबल क्लोथ भी ओरिगामी की लिमिट तक मोड़ा जा चुका था.

"अहेड ऑफ़ वट?"
"यू नो..." "अनुराग हैज़ ब्रोकेन अप विथ मी" "हाउ कैन ही डू दैट?"
इतना कह कर वो गंगा जमना हो गयी और मेरी हालत ख़राब. कहीं कोई हमें देख ले और समझने लगे की मैंने ही इसका ये हाल किया है. पर वो जल्दी ही संभल गयी. बेचारी पहले ही काफी रो चुकी होगी.
"दैट'स अन्फयेर, वेरी अन्फयेर. ही इज ए ब्लैडी फ्लर्ट. अच्छा ही हुआ तुम्हे जल्दी पता चल गया और तुम बच गयी. गोड नोज़ कितनी भोली भाली लड़कियों को..." मैं तब तक बोलता रहा जब तक उसके चेहरे से घटाएँ उठनी शुरू नहीं हो गयीं.
"यू नो, आई गेव हिम ऐवरी थिंग..."
मुझे ये सुनकर भयंकर जलन होने लगी. मेरे दिमाग के खाली गलियारों में ऐवरी थिंग...ऐवरी थिंग...ऐवरी थिंग...ऐवरी थिंग...देर तक गूंजता रहा.
"वट डू यू मीन ऐवरी थिंग? डिड यू...?"
"नो, नो, नोट आल दैट." "आई ट्रस्टएड हिम विद माय हार्ट एंड ही ब्रोक ईट" "मेरा दिल उसके पास था, यू नो, एंड ही ब्रोक ईट...ब्रोक ईट...ब्रोक ईट..."

मामला मेरी समझ में आने लगा. भला कौन समझाए इस बेवड़ी को, की प्यार व्यार में अपना दिल अपने पास रखना चाहिए. बिना बताये दूसरे को ठेकेदारी नहीं सौंपनी चाहिए. इंसान एक अपने दिल और दिमाग ही ठीक से संभाल ले बहुत है, दो दो की तो भूल जाओ. हाँ, अगर आपका दिल महज एक खिलौना है और आप इतनी पहुंची हुई शखसियत  हैं की ग़म और ख़ुशी आपके लिए कोई फरक नहीं रखते, तो फिर डर काहे का? आप इस फ़िज़ूल लेख को यहीं पढ़ना बंद करें और विंटर ट्रेक पर रवाना हो जाइये. बाकी नोर्मल बन्दे, मेरी लेखनी में आस्था रखते हुए आगे पढ़ते रहें.

देखिये, प्यार व्यार में कौनो बुराई नहीं है. मैं तो कहूँगा की चीज़ अच्छी है. जब तक चले, बल्ले बल्ले, जब रुके तो ठण्ड रख. एक खूबसूरत बगिया है, रोमांटिक गाने हैं, खुशबू है, भीनी भीनी गर्मी है (साँसों वाली), कीटाणु हैं. पंगा है एक्जिट गेट पर. आपका आँचल या पैंट बगिया की नुकीली बाड़ में अटकना नहीं चाहिए. एक और तरीका है इसे समझने का. आपकी स्वेटर, हैण्ड मेड बाय मॉम, का धागा आपके भूतपूर्व महबूब की किसी नुकीली चीज़ में फस गया है, और वो बेखटक आपसे दूर जा रहा है. आपकी स्वेटर पल पल उधड़ रही है. जितनी दूरी ज्यादा, उतना स्वेटर कम, और ज्यादा, और कम, ...करते करते, आप आध्यात्मिक तौर पर निर्वस्त्र हो जाते हैं और बहुत परेशान. रोना, धोना (रुमाल), एस एम एस, ट्वीट, फेसबुक अपडेट, दारू, स्त्री/पुरुष, आप वो सब करने लग जाते हैं जो नहीं करने चाहिए. ऐसा समय सोचने का होता है, माता वैष्णो देवी के १६ व्रत वाला या देवदास वाला रूप धरने का नहीं.

देखो बॉस, प्यार या किसी भी नजदीकी सम्बंध में अपना दिल अपने पास रखो. खेलने के लिए अपने पार्टनर को दे तो दो पर दिल पर अंकुश रखो, इसे ओझल मत होने दो. इतना बड़ा जिगर किसी का नहीं होता, की कोई आपका दिल तोड़ दे और आप कहें, "मुझ नाचीज़ पर इस एहसान का मैं कैसे शुक्र अदा करूँ!" कौन सी ऐसी मम्मी है जिसका शरारती टीटू ६ घंटे खाने खेलने के बाद पड़ोसी के यहाँ से रोते हुए आया हो और मम्मी ने चावला आंटी को न कोसा हो? कौन सा ऐसा बच्चा है, जिसने लाड़ में आकर अपना खिलौना पड़ोस वाली टिम्सी को दे तो दिया, लेकिन टूटने पर हाय तौबा नहीं मचाई?

दिल तो और भी कीमती चीज़ है. भूलिए मत, की हम उस देश के वासी हैं जो ट्रेन में अपना फटे कपड़ों से भरा कनस्तर भी चेन से बाँध कर रखते हैं. इसी तरह अपने दिल को भी रबड़ बैंड से बाँध कर रखें, की कोई ले भी ले तो भी अपने आस पास ही रहे. महबूब का अगर दिल भर जाये, और वो कागज़ के फूल वाली बातें करने लगे, तो पट्ट से अपना दिल अपने पास वापिस. वो जाएँ बनारस, और आप सीटी बजाते अगले इश्क के इंतज़ार में जनपथ पर.

इती कथा!