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Thursday, May 30, 2013

Government to use BATA to say TATA to Illegal Betting

My post published on Faking News: Government to use BATA to say TATA to Illegal Betting)




Shaken by the protests by the betting/fixing community against government’s proposal to use IRCTC website for online betting,  and by the political parties to BCCI’s proposal to hold just a Bookies’ Premier League (BPL), leaving them out, the Finance Minister, Mr. P. Chidumbaram, has offered a novel solution to calm the nerves of all stakeholders.
The Finance Minister, Mr. P. Chidumbaram, in a meeting with the heads of major political parties, bosses of the D-company and S-company, Chairpersons of BSE, NSE, MCX, Clearing Corporation of India (CCIL), and the Chairman of BCCI decided to legalize betting and allow trading of betting derived financial products related to sports, weather and politics on all the major stock exchanges, instead of a dedicated portal.
According to Mr. Chidumbaram, this will channel the humongous amount of black money back into the country’s economy and eliminate fixers. All betting operations in the country will be handled by the Betting Control Corporation of India (BCCI), as the erstwhile Board of Control for Cricket in India will now be officially known as. Plan is under way to accord legal immunity to Mr. Dalit Modi and appoint him the Chairperson of the BCCI. The minister said, “The government is sure that Mr. Modi will like to go one up on his earlier brainchild, the Indian Premier League (IPL), and script another financial blockbuster.”
The kingpins of the betting syndicates will be able to open ‘Betting and Trading Accounts (BATA)’ in nationalized banks, private banks, LIC and other financial institutions, who anyway have been using innovative (read ‘devious’) means to convert black money into white. These intermediaries will register with the BCCI and one or more stock exchanges to provide hassle free, completely online betting service to their clients. The BCCI will utilize trading platforms of BSE, NSE and MCX; and the clearing house services of the Clearing Corporation of India, which will also manage the odds offered on various betting products. In order to curb the menace of spot fixing, a joint surveillance team of all BATA members will be constituted. This is expected to provide fool-proof cross-surveillance by the BATA members.
The Finance Minister unveiled some of the salient features of the BATA scheme:
  1. Broking house status exclusively to all major political parties, D-company, S-company and other established global underworld operators, including the Italian Mafiosi. Italy, as usual, will be accorded the MFN status.
  2. No income tax on brokerage income. However, the profits of the investors will be treated as short-term capital gains.
  3. Clearing Corporation of India to oversee T+1 daily rolling settlement.
  4. BCCI and all banks and insurance companies recently exposed (read ‘recommended’) by the Cobrapost to be given financial intermediary licenses.
  5. Both cash and derivative products to be launched.
The first tranche of betting products contains some interesting choices like:
  • ‘Sree-IPL-MatchX-RPO-10’: Whether more than 10 runs per over will be conceded by an IPL bowler in a match e.g. Sreesanth in this case.
  • ‘Monsoon-DateX’: Whether it’ll rain on a particular day during the Monsoon season.  
  • ‘IPL-Eliminator-Qualify’: Whether team X will qualify for IPL eliminators.  
  • ‘Election-Result’: Result of a political election or the difference in vote count among candidates.
  • ‘Celeb-Child-Name3’: First three alphabets of a Bollywood celebrity’s child’s name e.g. AAR or ARA, etc.
  • ‘Delhi-Temp-20d’: Maximum/minimum temperature in Delhi 20 days from today.
  • ‘RahulG-Dinner-Aloo’: Will the poor family serve Rahul G aloo sabzi for dinner? etc.
As an aside, over a cup of tea with the reporters, Mr. Chidumbaram said, “We want every Indian, every Facebook and Twitter troll, including #Feku and #Pappu types, to place bets from the comfort of their homes and the subterranean operators to come over ground. And, as some of the smarter ones among you might have guessed by now, our next move will be to clear the decks for FDI in betting.” In a rare show of solidarity, BJP, SP, BSP, TMC and NDA have all pledged their support, keeping in context the billions of Rupees of income from brokerage. The Ladbrokes stock (LAD) on the London Stock Exchange hit the upper circuit filter in response to this announcement.
In an inexplicable fallout of this initiative, soon after the presser by the Finance Minister, the Delhi Police Commissioner, Mr. Dheeraj Kumar and Mumbai Police Commissioner Mr. He-Man Troy tendered their resignations. Reportedly, they felt that the introduction of BATA and the new BCCI will render them jobless anyway. 
The Home Minister, when contacted on phone in Las Vegas for his views on the development, said “Contact me after three hours!”

Tuesday, May 28, 2013

बचपन (भाग - IV)

जींद और रोहतक का नज़दीकी रिश्ता है। रोहतक, जींद से दिल्ली के रास्ते, लगभग आधे में पड़ता है। बड़ा शहर और जाट राजनीति का गढ़। जब पाकिस्तान से विस्थापित हुए तो ढेरों पंजाबी रोहतक और दिल्ली आकर बस गए। मेरे दादाजी, सरदार निहाल सिंह पहले दिल्ली में देव नगर (करोल बाग) में आकर बसे लेकिन अकेलेपन को न सह पाए और बिरादरी के बाकी लोगों के पास रहने के लिए रोहतक आ गए। रोहतक में ठिकाना मिला शौरी मार्किट के पास। शौरी मार्किट कपड़े की मशहूर मार्किट थी, शायद आज भी है। मुझे नए कपड़े के ख़ुशबू बहुत अच्छी लगती थी। पास ही में दुर्गियाणा मंदिर, प्रताप मोहल्ला, प्रताप टाकीज़, रेलवे रोड और भिवानी स्टैंड, जहाँ पहले भिवानी की बसें चला करती थीं, नया बस अड्डा बनने से पहले। मेरा जनम दिसम्बर की कोहरे भरी सुबह में इसी घर में हुआ था।


कुछ सालों बाद, बढ़ते परिवार के चलते, हम लोग प्रताप मोहल्ले में रहने लगे। पीले रंग का घर और मेहराबी दरवाज़ा। इसी घर में दादाजी ('पिताजी') झक सफ़ेद सलवार कमीज़ और तुर्हे वाली पगड़ी पहने 'वीर अर्जुन' पढ़ते। चाय हमेशा प्लेट में उड़ेल कर पीते। रोज़ शाम चार बजे, सज धज कर लाठी लेकर सैर को निकलते। कभी कभी में साथ हो लेता। हर दस बीस कदम पर लोग 'हेडमास्टर साहेब' को सलाम करते या चरण स्पर्श करते। रास्ते में दादाजी के मित्र काफिले में जुड़ जाते। पार्क में बैठ कर दुनिया के हाल पर शायराना तपसरा होता और पाकिस्तान की यादें ताज़ा होतीं। सब एक जैसे सफ़ेद कपड़ों में और तुर्हे वाली पगड़ी में, सिर्फ दाढ़ी से पता चलता की कौन सिख है। नाम भी एक जैसे: रामलुभाया, किशन, तिरलोचन या बिशन। सिर्फ 'लाल' या 'सिंह' के फर्क से हिन्दू और सिख कहलाते।

रोहतक वाला घर पिताजी की बदौलत हमारे वृहत 'रावल' परिवार का हेडक्वार्टर था। सभी परिवार गर्मी की छुट्टियों में रोहतक आ जाते और हम बच्चे खूब शरारतें और मस्ती करते। बड़े भाई जगजीत सिंह और सबसे छोटे चाचा सुरिंदर सिंह तब कॉलेज में पढ़ते थे। उन्हीं का जिम्मा होता था हमें भिवानी स्टैंड पर नागपाल के समोसे छोले और पंजाबी की कुल्फी खिलाने का। देर शाम जब अपनी कर्कश बांग देते हुए चना जोर गरम वाला आता तो हम सब अपनी अपनी कागज़ की कोन भरवा लेते। आखिरी में, रात को इंतज़ार करते लाल कपडे में लिपटी मलाई कुल्फी वाले की। उस्तरे नुमा चाकु से कुल्फी उतारता और केले के पत्ते पर देता। मलाई कुल्फी हमेशा कम लगती, काश की और पैसे होते! क्या पता था की बचपन के ये मज़े भी इस मलाई कुल्फी की तरह हमेश नाकाफ़ी लगेंगे।


रोहतक में हम खूब पतंगबाज़ी करते, उड़ाते कम और लूटते ज्यादा। एक से दूसरी छत लांघते और पतंग नहीं तो कम से कम मांझा लूटते। एक बार मैंने कटी पतंग का मांझा पकड़ा लेकिन पीछे से पतंग वाले ने लूट बचाने के लिए तेज़ी से मांझा खींचा। नतीजन, तर्जनी में गहरा कट और खून ही खून। आज भी उसी जगह निशान है आर सर्दियों में कुछ भी लगने से दर्द होता है। कभी कभी प्रताप टाकीज़ के दरवाज़े के बाहर से झाँक झाँक कर फिल्म देखते, या फिर, गेटमैन के डांटने पर, बाहर से ही कान लगा कर गाने सुनना और ढिशूम ढिशूम की आवाजें सुनते। बड़े भाईसाहब या सुरिंदर चाचा की मेहरबानी से कभी कभार फिल्म भी देखते और इंटरवल में बंटा लेमन पीते। अगले दिन सारे मोहल्ले को पता चल जाता की हम कौन सी पिक्चर देख कर आयें हैं। उस ज़माने में पिक्चर की सटोरी सुनाना/सुनना एक सामाजिक कार्य हुआ करता था। बकैदा फिल्म की कहानी और गानों की किताबें मिलती थीं।

गर्मी के मौसम में शौरी मार्किट के पास वाले बरफ़खाने में तरबूज़ ठंडा करके लाते। पहले तो पैसे देने पड़ते थे लेकिन जब पता चला की निहाल सिंह जी के परिवार से हैं तो मुफ्त में।

रोहतक माने दादाजी, उनका प्यार और जीवन दर्शन; दादीजी की हाथ की  बनी तंदूरी रोटियाँ, जो दो दिन बाद भी सूखती नहीं थीं; पड़ोसी के यहाँ दूरदर्शन पर सन्डे की ब्लैक एंड वाइट पिक्चर देखना (आंटी सब बच्चों को समोसे खिलाती थीं इंटरवल में); और, ट्रांजिस्टर के साथ लोफर फिल्म का गीत "ओ आज मौसम बड़ा बेइमान है" गुनगुनाना।

मैं पिताजी का प्रिय था क्यूंकि शरारतों के बावज़ूद पढ़ाई में अच्छा था। मुझसे हिंदी का अख़बार सुनते और हिसाब के सवाल पूछते। उनकी भाषा में उर्दू और फ़ारसी के शब्द होते, मसलन उनका ट्रिक क्वेश्चन "दो ज़रब  सिफ़र कितना होता है?" सही जवाब देने पर पांच पैसे मिलते। लाड़ के चलते मैं उनके हाथ के पीछे की त्वचा को ऊपर खींचता और कहता, "वेखो, तुस्सी बूढे हो गए हो हुण!"। वो हंस देते और मेरे हाथ की त्वचा खींचते और कहते, "वाह भई, तूं तां हाले जवान हैंगा।"

एक और मजेदार बात हमेशा होती रोहतक में। सब को पता था की भापाजी (मेरे डैडी का सम्मानपूर्वक संबोधन क्यूंकि वो भाइयों में सबसे बड़े थे) बहुत सख्त स्वभाव के हैं और मैं, उनका बेटा 'लवली', सबसे शरारती। मज़ाक के तौर पर सब लोग (खासकर राजपुरे वाले फूफा जी सरदार भगवान सिंह जी) मुझसे कहते की गाली निकालोगे तो पैसे मिलेंगे, छोटी गाली के पांच पैसे और बड़ी के दस! मैं कमाई करते ही घर से भागता और डैडी का गुस्सा ठंडा होने पर वापिस आता।

वृधावस्था में काफी समय दादाजी हमारे पास दिल्ली में रहे। हमेशा अपने पास बिठाते और उर्दू-फारसी में जीवनोपयोगी बातें सुनाते। मैं उनके हाथ के पीछे की कुम्हलायी त्वचा को खींचता और कहता, "वेखो, तुस्सी बूढे हो गए हो हुण"। वे हंस देते और मुझे गले से लगा लेते।      

**क्रमशः**         


      

Monday, May 27, 2013

बचपन (भाग - III)

घर की तरफ से पटियाला चौक आओ तो दाहिने तरफ रेलवे स्टेशन, बाईं तरफ शहर, और सीधे, नारनौंद। हांसी के रास्ते एक छोटा सा गाँव, जिला हिसार में। नारनौंद मेरे मामा रहते थे, ज़मींदार थे। बड़े मामा, सरदार बिशन सिंह और छोटे सरदार जसवंत सिंह। बड़े मामा और मम्मी जी में बहुत स्नेह था, मम्मी उनको 'भाइया जी' कहती थीं। मम्मी को बड़ा झटका लगा जब वो गए, कई दिनों तक गुमसुम रहीं।

मामाजी का रौबीला व्यक्तित्व था, लम्बे ऊंचे और लाल लाल गाल। हँसते तो आखें और भी छोटी हो जाती। हमेशा तहमद, कुर्ते और जूती पहनते थे। लिहाज़ा बड़े मामाजी मुझे भी बेहद प्यार करते। मुझे जब भी मौका लगता, मैं पटियाला चौक से हांसी जाने वाली बस से अकेला नारनौंद पहुँच जाता। नारनौंद उतर कर किसी भी गाँव वाले को कहता "सरदार बिशन सिंह के नोहरे पे जाना है" और लोग पहुंचा देते। मामाजी की बहुत इज्ज़त थी।

घर पहुँचता तो मामीजी या दर्शना दीदी हारे से मलाईदार दूध निकल कर पिलातीं और कुछ पैसे दे देतीं और मैं फ़र्राटे में नोहरे पर पहुँच जाता। दो नोहरे थे भाइयों के, एक बड़े मामाजी सँभालते और दूसरा जसवंत मामा। मैं अधिकतर बड़े मामाजी के यहाँ मज़े करता। नोहरे, आज की भाषा में 'खेतों का फ्रंटएंड', में ट्रेक्टर (मेरा प्रिय मैस्सी फ़र्गुसन), ढोर-डंगर , गोपाल (मामाजी का विश्वस्त) और कुछ कमरे होते थे। मैं नोहरे पर पहुँचते ही सारे खेतों का दौरा करता और फ़िर ट्यूबवेल पर स्नान और अमरुद और टमाटर का नाश्ता।

शाम को जब गोपाल भैंसों को दुहता तो मैं अपना दूसरा प्रिय शौक-सीधे थन से दूध की पिचकारी लेना-पूरा करता। गरम, हल्का नमकीन दूध, अधिकतर मूह में और थोडा नाक़ में और थोडा ठोड़ी के रास्ते कमीज़ पर। मेरा पहला शौक था मामाजी के साथ मैस्सी फ़र्गुसन की सवारी, कभी ट्राली के साथ (मुझे कम अच्छा लगता था क्यूंकि बहुत शोर करती थी ट्राली और स्पीड भी कम रखनी पड़ती थी) और कभी बिना ट्राली। एक बार पता चला की मामाजी का बुरा एक्सीडेंट हो गया ट्रेक्टर चलाते हुए, ट्राली निकल गयी चलते ट्रेक्टर से। बड़ी चोटें आयीं। मैं मिलने गया उनको। देखा गालों की लाली में कोई हर्ज़ा नहीं था। मुझे विश्वास हो गया की वे जल्दी ठीक हो जायेंगे।

एक दिन मामाजी ने कहा, "चल पुत्तर तैनू असली चीज़ दिखायिए" और हम पहुंचे ट्यूबवेल के पास जहाँ टोका (चारा काटने वाली मशीन) लगा हुआ था। अपने निकट भविष्य से बेखबर एक मोटा ताज़ा काला बकरा मिमियां रहा था। मामाजी ने नौकर से कहा, "चल पाई, कम करिये" और नौकर ने बकरे को बाँध कर टोके पे लोड कर दिया। जयकारे के साथ बकरा शहीद कर दिया गया। मैंने घबराकर मुहं फेर लिया लेकिन मामाजी हसतें हुए मुझे खींच कर अपने पास ले आये और कहते "शेर बण"। मामाजी बकरे के मांस से खून भरी गोलियाँ निकाल कर कच्ची ही खा जाते, कहते "यही असली चीज़ है"। मैं उनके गालों की लाली का राज़ समझ गया। अफ़सोस की मुझे कभी मांस रास नहीं आया।

नारनौंद से हमेशा खुश लौटता। दोनों मामों से पैसे मिलते और घर ले जाने के लिए देसी घी और फ़ल। कई दिनों तक अपनी बहनों और पड़ोस के बच्चों पर पैसे का रौब चलता।

१९८४ दंगों के चलते, दोनों मामा पंजाब चले गए। फिर ज्यादा मिलना नहीं हुआ। लेकिन जब कभी मम्मी को देखता हूँ, तो सरदार बिशन सिंह 'शेर' की याद बरबस आ जाती है।

**क्रमश:**

Thursday, May 23, 2013

बचपन (भाग - II)


(कृपया, पहले बचपन (भाग - I) अवश्य पढ़ें।)

जींद, पहले एक राजसी ठिकाना हुआ करता था, अब पंजाब मेल के रास्ते रोहतक और पटियाला के बीच में एक साधारण सा जिला है। रुई का व्यापार होता है। शहर के बीचों-बीच रानी का तालाब और उसके बीचों-बीच रानी का मंदिर उर्फ़ भूतेश्वर मंदिर। पहचान था शहर की, अब भी है।

 


१९६६ में जब हरियाणा बना तब हम पटियाला चौक के नज़दीक रहते थे, मेन रोड पर। पेप्सू (अब पंजाब) रोडवेज की बसों को रोककर परेशान करने का सिलसिला चल रहा था। मैंने जलती लकड़ी का टुकड़ा एक पेप्सू रोडवेज की बस के नीचे फेंक दिया। ड्राईवर सरदार था, बस को सड़क किनारे लगाकर मेरे पीछे हो लिया। मैं घर के पिछले दरवाज़े से निकल, अमरुद के बाग में छिप कर बचा। सरदार मम्मी को खरी खोटी सुनाकर गया। मम्मी ने वही गुस्सा मुझ पर निकाला। पिटने में बहुत उस्ताद था मैं। बहनें मम्मी को रोकतीं तो उनको भी प्रसाद मिल जाता।



पड़ोस में दायें बाजू में  डॉ सहगल, सहगल आंटी और उनके बच्चे किट्टू, अनिल और राणों। सहगल साहेब सरकारी अस्पताल में काम करते थे। गर्मियों में मक्खी मारने वाली लाल दवाई लाकर देते थे। किट्टू लाडला था अपनी मम्मी का। सहगल आंटी कैंसर से गयीं। जाते-जाते सब को कहती रहीं, "मेरे किट्टू को पराठे बहुत अच्छे लगते हैं, खिलाते रहना।"

बाएं बाजु में मालिक साहेब और उनके किरायेदार डॉ घोषाल। डॉ घोषाल सरकारी अस्पताल के बड़े अफसर थे। उनके मोटे ताज़े बच्चे कौस्तुभ रंजन और मिट्ठू। कौस्तुभ का नाम जल्द ही 'प्लास्टक' पड़ गया, बोलने में आसान। अपनी एयर गन से कव्वों का शिकार करता था। मिसेस घोषाल बहुत बन ठन के निकलती थीं, बड़ा सा नकली जूड़ा और ढेरों मेकअप। हम सब उन्हें 'हीरोइन' कहते थे।

तब हरियाणा में आर्य समाज का ज़ोर था। हर इतवार सुबह सफ़ेद कुरते-पजामे में चौधरी दल सिंह MLA के घर प्रांगण में गायत्री का जाप और उसके बाद आलू-पूरी का लंगर। दल सिंह जी की पत्नी सिख परिवार से थीं, इसीलिए मुझे बहुत प्यार करती थीं। उनकी तीन बेटियां थी। मझली और छोटी मेरी दोस्त थीं। छत पर कॉमिक्स से भरा कमरा था उनके यहाँ। 'मोटू-पतलू', 'मैनड्रैक' और जाने क्या क्या। मुझे मैनड्रैक का "फ़िसल पड़ो!" वाला सम्मोहन बहुत अच्छा लगता था। जब कॉमिक्स और खाने पीने से निपट लेते थे तो उनके अंगूर के बाग़ से अंगूर तोड़ते और ट्यूब वेल की होद्दी में नहाते। चौधरी साहेब के घर के बाहर बड़ा सा लोहे का गेट था। एक बार झूलते-झूलते मेरा माथा जा टकराया गेट में और खून ही खून। आज भी निशान मौजूद है।

स्कूल था अमरुद के बाग और चने के खेत के परे 'जाट प्राइमरी स्कूल', रेलवे रोड पर। खुले मैदान में, नीम की छाँव में तपड़ पर बैठ कर पढ़ते थे। हर गलत जवाब, गन्दी तख्ती, गन्दी लिखाई, होमवर्क न करने या गाली देने पर संटी का करार प्रहार। आधी छुट्टी में आम पापड़, मरुंडा और छोले। कभी-कभी स्कूल के ख़तम होने पर, पड़ोस की चमारों की बस्ती से भयंकर चीत्कार होता। पता चला की सूअर हलाल करते थे। देखने गया। दिल बैठ गया निर्ममता देख कर। स्कूल से घर के रास्ते जम के मटरगश्ती। अपना बस्ता दे देता था किसी सहपाठी को घर देने के लिए और दुनिया भर की शरारतें। ट्यूब वेल की होद्दी में पांच पैसे का सिक्का डूबोकर ढूँढना, साइकिल का रिम दोड़ाना, अमरुद के बाग से चोरी और चने के खेत से छोलिये की चोरी।



हमारी कालोनी शहर के छोर पर थी। सब तरफ खेत। गुड़ बनाने के मौसम में ताज़ा शीरा और गुड़ खाते। रात ढलते ही, शलगम की क्यारी से शलगम की चोरी करते। एक दफ़ा घबराहट में लोहे की बाड़ वाली तार घुस गयी टांग में। अब भी लम्बा निशान है टांग पर। कृषि उत्पाद सम्बंधित चोरी का सबसे बड़ा खामियाज़ा भुगता जब एक बार अमरुद के बाग का माली मेरा पीछा करते करते घर पहुँच गया और मम्मी को खूब खरी-खोटी सुना गया। जब मैं डरते डरते रात को घर में घुसा तो मम्मी सब्जी पका रहीं थीं। हाथ में ली कड़छी और छाप दी मेरे सर पे। हर बार की तरह सामने वाले डॉ लाठर ने मरहम पट्टी की। आज भी निशान है सर के बीचों-बीच।

पिटाई के मामले में दो और धुरंधर थे पड़ोस में। एक नसवारी ताई का बदनसीब भतीजा चरणी और दूसरा खाती कालोनी का सुनहरा। चरणी मेरा रेस पार्टनर था। घर से पटियाला चौक के जोहड़ तक साइकिल रिम की दौड़। चरणी आदतन मुँह से मोटरसाइकिल की आवाज़ निकालते भागता, कभी कभी मैं भी। नसवारी ताई गोरी चिट्टी थी और घर के आगे बैठ सारा दिन नसवार खींचना, हुक्का पीना और चुगली करना। थक जाने पर, "अर्रे चरणी कित मरग्या तूं? कुछ काम भी करैगा अक रोट खाता रवेगा?" बेचारा पतला सूखा चरणी प्रगट होता, ताई का झन्नाटेदार थप्पड़ खाता, चिल्लम भरता और ताई की मांसल भुजाओं को ज़मीन पर बैठकर गूँधता। ताई चरणी के बाल थोड़े बड़े होते ही उसे गंजा करवा देती। पैसे कम लगते थे। मेरा दिल पसीजता रोते हुए पतले गंजे चरणी को देखकर।

सुनहरे का सिर्फ नाम सुनेहरा था लेकिन रोज़ाना जीवन में अँधेरा ही अँधेरा। बाप के मरने के बाद माँ ने दूसरी शादी कर ली। देखने में अच्छी थी, इसीलिए हो गयी। सुनहरे का नया बाप एक नंबर का ऊत। भट्ठे पे काम करता था। हर शाम बेनागा शराब पीना, पहले सुनहरे को पीटना और फिर बीच आँगन सुनहरे की माँ से प्रेमालाप और जोर जोर से बकना, "हा हा हा, मेरी जोरू है ये…कुछ भी करूं!"। सुनहरा रोते रोते मुझसे कहता, "साला अभी मेरे से तगड़ा है, थोड़ा बड़ा हो जाऊं फिर रोज़ पीटूंगा साले को."

**क्रमश:**
 



Wednesday, May 22, 2013

बचपन (भाग - I)



मेरा जनम तब के पंजाब में हुआ था, नौनिहाल रोहतक में। १९६६ में पंजाब का ये हिस्सा हरियाणा हो गया। जनम से लेकर कॉलेज की पढ़ाई तक हरियाणा में ही रहा। डैडी की नौकरी दिल्ली में थी, लाइब्रेरियन थे, सरकारी स्कूल में। मम्मी हरियाणा के प्रौड़ शिक्षा विभाग में सुपरवाइजर थीं, लड़कियों और महिलाओं को आत्मनिर्भरता के लिए सिलाई-कढ़ाई सिखाती थीं । सरकारी जीप में जिले के सभी गावों में जा जा कर प्रौड़ शिक्षा केन्द्रों का निरिक्षण करती थीं। जब कभी फ़िल्म दिखाने वाली गाड़ी के साथ जाती थीं, तो मैं भी साथ हो लेता, जीप की अगली सीट पर, एक पैर बाहर निकाले। रात हो जाती तो सरपंच या स्कूल हेडमास्टर के घर आलू जीरे की तरकारी और चूल्हे पर बने रोट खाते।



बड़ी सुव्यवस्थित और जीवट वाली थी  मम्मी। अब भी हैं। डायरी रखती थी, मोतियों सी सुन्दर लिखाई में सारे सरकारी दौरों का ब्यौरा और एक एक पैसे का हिसाब। पांच बच्चों के लालन पालन का जिम्मा जो था। डैडी महीने में एक दो बार दिल्ली से हमारे पास आते थे। बहुत ही मेहनती थे, आज भी हैं। डैडी सख्त और गुस्सेल थे, हम बच्चे उनके दिल्ली वापिस जाने का इंतज़ार बेसब्री से करते। मम्मी की नौकरी की बदौलत हम हरियाणा के कई जिलों में रहे, सबसे लम्बे समय के लिए महेंद्रगढ़ और जींद में। ये लेख मेरे शुरुआती बचपन की झलकियाँ हैं। कुछ धुंधले श्याम-श्वेत चित्र जो मिटाए नहीं मिटते।

<चित्र १>
महेंद्रगढ़ जिले (अब भिवानी जिले) का एक छोटा सा गाँव मान्हेडू। मरुस्थली ज़मीन, पील के छोटे लेकिन मजबूत पेड़, एक हरे पानी वाला जोहड़, स्कूल, और स्कूल के रास्ते एक लकड़ी के शहतीर से बनाया उंच-नीच वाला झूला। स्कूल के रास्ते में ईंटों का भट्ठा और भट्ठे पर काम करने वालों की झोंपड़िया। एक बार बहुत प्यास लगी तो पानी मांग लिया भट्ठे वाली से। बड़ी बहन के मना करने पर भी पिया।

जोहड़ में भैंसे नहाती थी। हम बच्चे उनकी पीठों पर बैठ कर सवारी करते और जोहड़ में नहाते।

ज़बरदस्त गर्मी होती थी। राजस्थान की तरह। मिट्टी भरे बवंडर और काली आंधियां। सत्तू पी पी कर और कतली खा कर निकलती थीं गर्मियाँ। मम्मी कतली का डिब्बा अपने दफ्तर में रखती थीं। वहां जाना पड़ता था खाने। घर में रखतीं तो एक दिन में उड़ जाती। बड़े शरारती थे, मैं और मेरी मझली बहन पिंकी। पतंग उड़ाने के बेहद शौक़ीन। एक बार पिंकी गिर पड़ी थी खुले जीने से। पतंग की डोर उलझ गयी थी पैर में।

दूध और हमारा दोपहर का खाना एक छोटी जालीदार अलमारी में रखा रहता था। एक दफा हम बच्चों ने लापरवाही से घर के बहार का दरवाज़ा खुला रह गया और एक कुत्ते ने जाली फाड़कर सब खा लिया। खूब डांट पड़ी।                     

एक बार घर के सामने वाली कीचड़ सनी गली में हंगामा हो गया। खूब शोर शराबा और लट्ठबाजी। चमार इस गली में नहीं आ सकते थे, लेकिन आ गए थे।

पील के पेड़ पर पील लगती थीं। छोटी-छोटी हरी गोलियां पतली टहनी पर। पील के पेड़ पर चढ़ना आसान होता था।  पील के पेड़ गाँव से महेंद्रगढ़ को जाने वाली सड़क पर लगते थे। उसी तरफ मेरे सबसे अच्छे दोस्त का घर भी था। भूरी खिड़की और दरवाज़े और घर के आगे भैंस बंधी हुई। दोस्त की माँ हमेशा कुछ न कुछ खाने को देती।

जब मम्मी बताती की आज डैडी आयेंगे, तो मैं गाँव के छोर पर जाकर हर आने वाली बस का इंतज़ार करता। टॉफ़ी और खिलोनों की उम्मीद लेकर।

***क्रमशः***









Thursday, May 16, 2013

Buying Your Next Car?


Buying a car, for middle class Delhiites (every Indian?), is always a big deal. We are a demonstrative lot and always fuss over stuff that we can carry around to impress others e.g. car, home address, kids’ school, wife, mobile phone and personal effects. And, since we cannot change the wife, home address and kids’ school so easily, we must cure our libido via retail therapy as applied to mobile phone and car. 


It’s a well known phenomenon that Delhi gets a collective hard on every time a new smart phone or a new car is launched. Of these two, mobile phone purchases are easier to handle e.g. “Sir, 16 hazaar ki DP aur 6 EMIs ho jayengi.” However, when it comes to cars (unless you are supplying supari and elaichi to Rajnigandha paan masala makers; or happen to work for MCD, DDA or Delhi Police; or, are an erstwhile landowner of a Delhi/NCR village), a lot of research must be done to arrive at a decision.  

The most common trigger for starting the search for your new car is the combination of the impending exhaustion of EMI payments of your existing car and the fact that Mr. Malhotra, your neighbor, has just parked a new (polythene covers intact) Hyundai Fluidic Verna SX in front of his house. You first try to wish it away by believing that it must be a relative visiting the Malhotras but your heart sinks to 60/100 BP level when you receive a 4-ladoo-box. The epicenter of the seismic activity is right next door! You lay down restlessly at night, with the fluorescence of the last-watched TV soap blinking in your eyes.

“हो गई है पीर पर्वत-सी, पिघलनी चाहिए| इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए”

Usually the first step in car purchase is preparing a short list of candidates on the basis of budget (most likely to be stretched beyond the elastic limit to accommodate the huge libido), manufacturers to avoid (resale value, snob value, etc.) and fuel type. The next step is some serious Internet research via Autocar/Top Gear/Car&Bike/BS Motoring, Team-BHP and, in a moment of weakness, sites like CarWaale, etc. and weekend visits (in bermudas, t-shirt and sandals) to car showrooms, including irrational ones to BMW and Audi.
“Toyota ke liye Galaxy Moti Nagar jaiyo. Ladki test drive karwati hai.”
“Normal activities ke liye toh leg room kaafi hai Sir”
“Axis waale chor hain Sir.”
 “Ye BMW wala kya samajhta hai apne aap ko? Bhikhari samajh…”

Three months of showroom hopping, website hopping, 3 MB MS Excel comparison sheet and copious bakchodi over gazillion cups of tea and you reach the ‘reverse archipelago’ situation. You are marooned on an island with your wife and grown up children and surrounded by a ring of swimming pools named Honda, Toyota, Hyundai, Ford, Volkswagen and Chevrolet, full of happy and some not-so-happy semi-naked people. You deliberately step away from the Suzuki pool. “Hai toh Mruti hi na!” There is Babel of voices calling out from the various pools.
“Ford toh Haryana mein zyada chalti hai.”
“Kya, Chevrolet? Hamari le lo…hum toh khud pareshan hain. AC ki knob dhai hazar ki hai!”
“Honda bahut delicate hai. Speed breaker pe atak jaati hai.”
“Nai gaadi hai. Vaise toh Jerman hai lekin…”
“Toyota ab woh Toyota nahin rahi Sir. Maximum recalls hain.”

You are back to the 60/100 BP condition. The family mood is down. Father’s advice to avoid unnecessary expenditure is again gaining strength. Your strongest ally, Mother, is also training longer-than-usual stares at her son. In the meanwhile, a shiny white Fluidic Verna SX with “Malhotras’” emblazoned on its rear, xenon lamps and blue underlights is playing the Best of Honey Singh full tilt. Your life is not getting any better.
What about Twitter and Facebook? The odds are as good as growing a single hair after applying 10 bottles of Dr Batra’s Potion with Sehwag’s picture on it, but, may be, just-may-be, someone could offer sensible advice! So, you post “Finlzng on ma nxt car. Bgt 10-14. Sugg plzz.TIA!”

(Facebook wisdom)
“Oye MP, teri lottry lagi haikya? ;-P”
“Read this: <link to the 3 year old Team-BHP post you’ve already read>. Best of luck! J
“If u cn ++ your bugt by anthr 4-5L…”
“Congratulationzzz Mamaji!!!!!!!”
“Yayyyyy partyyyyy”
“Sorry, I’m in Vegas for a full month L

(Twitter wisdom)
@NothatMP Congo Sir! Party toh banti hai!!
RT “@NotThatMP Finlzng on ma nxt car. Bgt 10-14. Sugg plzz.TIA!”
@NotThatMP Anything but Hyndai! Suucks big time!! Bastards!!!
@NotThatMP Bot a Ford. Cryng lyk nythng L  
@NotThatMP Please tag your posts with #3MCarCare to enter the 3M Car Care Contest. Starts at 3 PM today.

Your situation has now worsened to 50/80 BP condition with loss of appetite and blurry vision. You can’t take it anymore and feel like Ashoka-the-not-so-great in the wake of Kalinga. The bedroom silence is chilling. You exhale extra-large and tell your wife,
“Chhodo yaar! Apni Accent fussclass chal rahi hai. Waise bhi hamein cash conserve karna chahiye. Simran ke college admission ke liye lakh-do lakh toh chahiye honge.”
Wife, “Haan, wo toh hai”
Wife, after a pause, “Par paise toh manage ho jayenge…”
Husband, “Baat paise ke nahin hai. Koi car pasand hi nahi aa rahi”
Wife, “Civic theek toh hai. Dekhne mein bhi badi lagti hai. Maroon color lenge.”
Husband, “Lekin, Autocar ke Buying Guide mein likha hai ki…”
Wife, “Lekin vekin kuchh nahin. Bhaad mein gayi tumhari Autocar aur Internet aur Facebook aur Tutor. Mujhe toh bas Civic hi chahiye. Kal booking amount de aayenge. Ab so jao”