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Wednesday, May 22, 2013

बचपन (भाग - I)



मेरा जनम तब के पंजाब में हुआ था, नौनिहाल रोहतक में। १९६६ में पंजाब का ये हिस्सा हरियाणा हो गया। जनम से लेकर कॉलेज की पढ़ाई तक हरियाणा में ही रहा। डैडी की नौकरी दिल्ली में थी, लाइब्रेरियन थे, सरकारी स्कूल में। मम्मी हरियाणा के प्रौड़ शिक्षा विभाग में सुपरवाइजर थीं, लड़कियों और महिलाओं को आत्मनिर्भरता के लिए सिलाई-कढ़ाई सिखाती थीं । सरकारी जीप में जिले के सभी गावों में जा जा कर प्रौड़ शिक्षा केन्द्रों का निरिक्षण करती थीं। जब कभी फ़िल्म दिखाने वाली गाड़ी के साथ जाती थीं, तो मैं भी साथ हो लेता, जीप की अगली सीट पर, एक पैर बाहर निकाले। रात हो जाती तो सरपंच या स्कूल हेडमास्टर के घर आलू जीरे की तरकारी और चूल्हे पर बने रोट खाते।



बड़ी सुव्यवस्थित और जीवट वाली थी  मम्मी। अब भी हैं। डायरी रखती थी, मोतियों सी सुन्दर लिखाई में सारे सरकारी दौरों का ब्यौरा और एक एक पैसे का हिसाब। पांच बच्चों के लालन पालन का जिम्मा जो था। डैडी महीने में एक दो बार दिल्ली से हमारे पास आते थे। बहुत ही मेहनती थे, आज भी हैं। डैडी सख्त और गुस्सेल थे, हम बच्चे उनके दिल्ली वापिस जाने का इंतज़ार बेसब्री से करते। मम्मी की नौकरी की बदौलत हम हरियाणा के कई जिलों में रहे, सबसे लम्बे समय के लिए महेंद्रगढ़ और जींद में। ये लेख मेरे शुरुआती बचपन की झलकियाँ हैं। कुछ धुंधले श्याम-श्वेत चित्र जो मिटाए नहीं मिटते।

<चित्र १>
महेंद्रगढ़ जिले (अब भिवानी जिले) का एक छोटा सा गाँव मान्हेडू। मरुस्थली ज़मीन, पील के छोटे लेकिन मजबूत पेड़, एक हरे पानी वाला जोहड़, स्कूल, और स्कूल के रास्ते एक लकड़ी के शहतीर से बनाया उंच-नीच वाला झूला। स्कूल के रास्ते में ईंटों का भट्ठा और भट्ठे पर काम करने वालों की झोंपड़िया। एक बार बहुत प्यास लगी तो पानी मांग लिया भट्ठे वाली से। बड़ी बहन के मना करने पर भी पिया।

जोहड़ में भैंसे नहाती थी। हम बच्चे उनकी पीठों पर बैठ कर सवारी करते और जोहड़ में नहाते।

ज़बरदस्त गर्मी होती थी। राजस्थान की तरह। मिट्टी भरे बवंडर और काली आंधियां। सत्तू पी पी कर और कतली खा कर निकलती थीं गर्मियाँ। मम्मी कतली का डिब्बा अपने दफ्तर में रखती थीं। वहां जाना पड़ता था खाने। घर में रखतीं तो एक दिन में उड़ जाती। बड़े शरारती थे, मैं और मेरी मझली बहन पिंकी। पतंग उड़ाने के बेहद शौक़ीन। एक बार पिंकी गिर पड़ी थी खुले जीने से। पतंग की डोर उलझ गयी थी पैर में।

दूध और हमारा दोपहर का खाना एक छोटी जालीदार अलमारी में रखा रहता था। एक दफा हम बच्चों ने लापरवाही से घर के बहार का दरवाज़ा खुला रह गया और एक कुत्ते ने जाली फाड़कर सब खा लिया। खूब डांट पड़ी।                     

एक बार घर के सामने वाली कीचड़ सनी गली में हंगामा हो गया। खूब शोर शराबा और लट्ठबाजी। चमार इस गली में नहीं आ सकते थे, लेकिन आ गए थे।

पील के पेड़ पर पील लगती थीं। छोटी-छोटी हरी गोलियां पतली टहनी पर। पील के पेड़ पर चढ़ना आसान होता था।  पील के पेड़ गाँव से महेंद्रगढ़ को जाने वाली सड़क पर लगते थे। उसी तरफ मेरे सबसे अच्छे दोस्त का घर भी था। भूरी खिड़की और दरवाज़े और घर के आगे भैंस बंधी हुई। दोस्त की माँ हमेशा कुछ न कुछ खाने को देती।

जब मम्मी बताती की आज डैडी आयेंगे, तो मैं गाँव के छोर पर जाकर हर आने वाली बस का इंतज़ार करता। टॉफ़ी और खिलोनों की उम्मीद लेकर।

***क्रमशः***









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