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Thursday, May 23, 2013

बचपन (भाग - II)


(कृपया, पहले बचपन (भाग - I) अवश्य पढ़ें।)

जींद, पहले एक राजसी ठिकाना हुआ करता था, अब पंजाब मेल के रास्ते रोहतक और पटियाला के बीच में एक साधारण सा जिला है। रुई का व्यापार होता है। शहर के बीचों-बीच रानी का तालाब और उसके बीचों-बीच रानी का मंदिर उर्फ़ भूतेश्वर मंदिर। पहचान था शहर की, अब भी है।

 


१९६६ में जब हरियाणा बना तब हम पटियाला चौक के नज़दीक रहते थे, मेन रोड पर। पेप्सू (अब पंजाब) रोडवेज की बसों को रोककर परेशान करने का सिलसिला चल रहा था। मैंने जलती लकड़ी का टुकड़ा एक पेप्सू रोडवेज की बस के नीचे फेंक दिया। ड्राईवर सरदार था, बस को सड़क किनारे लगाकर मेरे पीछे हो लिया। मैं घर के पिछले दरवाज़े से निकल, अमरुद के बाग में छिप कर बचा। सरदार मम्मी को खरी खोटी सुनाकर गया। मम्मी ने वही गुस्सा मुझ पर निकाला। पिटने में बहुत उस्ताद था मैं। बहनें मम्मी को रोकतीं तो उनको भी प्रसाद मिल जाता।



पड़ोस में दायें बाजू में  डॉ सहगल, सहगल आंटी और उनके बच्चे किट्टू, अनिल और राणों। सहगल साहेब सरकारी अस्पताल में काम करते थे। गर्मियों में मक्खी मारने वाली लाल दवाई लाकर देते थे। किट्टू लाडला था अपनी मम्मी का। सहगल आंटी कैंसर से गयीं। जाते-जाते सब को कहती रहीं, "मेरे किट्टू को पराठे बहुत अच्छे लगते हैं, खिलाते रहना।"

बाएं बाजु में मालिक साहेब और उनके किरायेदार डॉ घोषाल। डॉ घोषाल सरकारी अस्पताल के बड़े अफसर थे। उनके मोटे ताज़े बच्चे कौस्तुभ रंजन और मिट्ठू। कौस्तुभ का नाम जल्द ही 'प्लास्टक' पड़ गया, बोलने में आसान। अपनी एयर गन से कव्वों का शिकार करता था। मिसेस घोषाल बहुत बन ठन के निकलती थीं, बड़ा सा नकली जूड़ा और ढेरों मेकअप। हम सब उन्हें 'हीरोइन' कहते थे।

तब हरियाणा में आर्य समाज का ज़ोर था। हर इतवार सुबह सफ़ेद कुरते-पजामे में चौधरी दल सिंह MLA के घर प्रांगण में गायत्री का जाप और उसके बाद आलू-पूरी का लंगर। दल सिंह जी की पत्नी सिख परिवार से थीं, इसीलिए मुझे बहुत प्यार करती थीं। उनकी तीन बेटियां थी। मझली और छोटी मेरी दोस्त थीं। छत पर कॉमिक्स से भरा कमरा था उनके यहाँ। 'मोटू-पतलू', 'मैनड्रैक' और जाने क्या क्या। मुझे मैनड्रैक का "फ़िसल पड़ो!" वाला सम्मोहन बहुत अच्छा लगता था। जब कॉमिक्स और खाने पीने से निपट लेते थे तो उनके अंगूर के बाग़ से अंगूर तोड़ते और ट्यूब वेल की होद्दी में नहाते। चौधरी साहेब के घर के बाहर बड़ा सा लोहे का गेट था। एक बार झूलते-झूलते मेरा माथा जा टकराया गेट में और खून ही खून। आज भी निशान मौजूद है।

स्कूल था अमरुद के बाग और चने के खेत के परे 'जाट प्राइमरी स्कूल', रेलवे रोड पर। खुले मैदान में, नीम की छाँव में तपड़ पर बैठ कर पढ़ते थे। हर गलत जवाब, गन्दी तख्ती, गन्दी लिखाई, होमवर्क न करने या गाली देने पर संटी का करार प्रहार। आधी छुट्टी में आम पापड़, मरुंडा और छोले। कभी-कभी स्कूल के ख़तम होने पर, पड़ोस की चमारों की बस्ती से भयंकर चीत्कार होता। पता चला की सूअर हलाल करते थे। देखने गया। दिल बैठ गया निर्ममता देख कर। स्कूल से घर के रास्ते जम के मटरगश्ती। अपना बस्ता दे देता था किसी सहपाठी को घर देने के लिए और दुनिया भर की शरारतें। ट्यूब वेल की होद्दी में पांच पैसे का सिक्का डूबोकर ढूँढना, साइकिल का रिम दोड़ाना, अमरुद के बाग से चोरी और चने के खेत से छोलिये की चोरी।



हमारी कालोनी शहर के छोर पर थी। सब तरफ खेत। गुड़ बनाने के मौसम में ताज़ा शीरा और गुड़ खाते। रात ढलते ही, शलगम की क्यारी से शलगम की चोरी करते। एक दफ़ा घबराहट में लोहे की बाड़ वाली तार घुस गयी टांग में। अब भी लम्बा निशान है टांग पर। कृषि उत्पाद सम्बंधित चोरी का सबसे बड़ा खामियाज़ा भुगता जब एक बार अमरुद के बाग का माली मेरा पीछा करते करते घर पहुँच गया और मम्मी को खूब खरी-खोटी सुना गया। जब मैं डरते डरते रात को घर में घुसा तो मम्मी सब्जी पका रहीं थीं। हाथ में ली कड़छी और छाप दी मेरे सर पे। हर बार की तरह सामने वाले डॉ लाठर ने मरहम पट्टी की। आज भी निशान है सर के बीचों-बीच।

पिटाई के मामले में दो और धुरंधर थे पड़ोस में। एक नसवारी ताई का बदनसीब भतीजा चरणी और दूसरा खाती कालोनी का सुनहरा। चरणी मेरा रेस पार्टनर था। घर से पटियाला चौक के जोहड़ तक साइकिल रिम की दौड़। चरणी आदतन मुँह से मोटरसाइकिल की आवाज़ निकालते भागता, कभी कभी मैं भी। नसवारी ताई गोरी चिट्टी थी और घर के आगे बैठ सारा दिन नसवार खींचना, हुक्का पीना और चुगली करना। थक जाने पर, "अर्रे चरणी कित मरग्या तूं? कुछ काम भी करैगा अक रोट खाता रवेगा?" बेचारा पतला सूखा चरणी प्रगट होता, ताई का झन्नाटेदार थप्पड़ खाता, चिल्लम भरता और ताई की मांसल भुजाओं को ज़मीन पर बैठकर गूँधता। ताई चरणी के बाल थोड़े बड़े होते ही उसे गंजा करवा देती। पैसे कम लगते थे। मेरा दिल पसीजता रोते हुए पतले गंजे चरणी को देखकर।

सुनहरे का सिर्फ नाम सुनेहरा था लेकिन रोज़ाना जीवन में अँधेरा ही अँधेरा। बाप के मरने के बाद माँ ने दूसरी शादी कर ली। देखने में अच्छी थी, इसीलिए हो गयी। सुनहरे का नया बाप एक नंबर का ऊत। भट्ठे पे काम करता था। हर शाम बेनागा शराब पीना, पहले सुनहरे को पीटना और फिर बीच आँगन सुनहरे की माँ से प्रेमालाप और जोर जोर से बकना, "हा हा हा, मेरी जोरू है ये…कुछ भी करूं!"। सुनहरा रोते रोते मुझसे कहता, "साला अभी मेरे से तगड़ा है, थोड़ा बड़ा हो जाऊं फिर रोज़ पीटूंगा साले को."

**क्रमश:**
 



5 comments:

  1. Dear MPS,You have really enjoyed your childhood,that s why so many memories you can remember even today.A really lucky guy, Shardindu

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  2. Enjoyed reading it. Along with your memories, you have nicely described socio-cultural conditions of North India (Punjab and Haryana). Keep posting, especially your Hindi blogs :)

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  4. Such an awesome post on Childhood & having written it in Hindi even better!Sometimes English just cannot match d warmth Hindi has!

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