About Me

My photo
Your average fun guy who will stand by you!

Monday, May 27, 2013

बचपन (भाग - III)

घर की तरफ से पटियाला चौक आओ तो दाहिने तरफ रेलवे स्टेशन, बाईं तरफ शहर, और सीधे, नारनौंद। हांसी के रास्ते एक छोटा सा गाँव, जिला हिसार में। नारनौंद मेरे मामा रहते थे, ज़मींदार थे। बड़े मामा, सरदार बिशन सिंह और छोटे सरदार जसवंत सिंह। बड़े मामा और मम्मी जी में बहुत स्नेह था, मम्मी उनको 'भाइया जी' कहती थीं। मम्मी को बड़ा झटका लगा जब वो गए, कई दिनों तक गुमसुम रहीं।

मामाजी का रौबीला व्यक्तित्व था, लम्बे ऊंचे और लाल लाल गाल। हँसते तो आखें और भी छोटी हो जाती। हमेशा तहमद, कुर्ते और जूती पहनते थे। लिहाज़ा बड़े मामाजी मुझे भी बेहद प्यार करते। मुझे जब भी मौका लगता, मैं पटियाला चौक से हांसी जाने वाली बस से अकेला नारनौंद पहुँच जाता। नारनौंद उतर कर किसी भी गाँव वाले को कहता "सरदार बिशन सिंह के नोहरे पे जाना है" और लोग पहुंचा देते। मामाजी की बहुत इज्ज़त थी।

घर पहुँचता तो मामीजी या दर्शना दीदी हारे से मलाईदार दूध निकल कर पिलातीं और कुछ पैसे दे देतीं और मैं फ़र्राटे में नोहरे पर पहुँच जाता। दो नोहरे थे भाइयों के, एक बड़े मामाजी सँभालते और दूसरा जसवंत मामा। मैं अधिकतर बड़े मामाजी के यहाँ मज़े करता। नोहरे, आज की भाषा में 'खेतों का फ्रंटएंड', में ट्रेक्टर (मेरा प्रिय मैस्सी फ़र्गुसन), ढोर-डंगर , गोपाल (मामाजी का विश्वस्त) और कुछ कमरे होते थे। मैं नोहरे पर पहुँचते ही सारे खेतों का दौरा करता और फ़िर ट्यूबवेल पर स्नान और अमरुद और टमाटर का नाश्ता।

शाम को जब गोपाल भैंसों को दुहता तो मैं अपना दूसरा प्रिय शौक-सीधे थन से दूध की पिचकारी लेना-पूरा करता। गरम, हल्का नमकीन दूध, अधिकतर मूह में और थोडा नाक़ में और थोडा ठोड़ी के रास्ते कमीज़ पर। मेरा पहला शौक था मामाजी के साथ मैस्सी फ़र्गुसन की सवारी, कभी ट्राली के साथ (मुझे कम अच्छा लगता था क्यूंकि बहुत शोर करती थी ट्राली और स्पीड भी कम रखनी पड़ती थी) और कभी बिना ट्राली। एक बार पता चला की मामाजी का बुरा एक्सीडेंट हो गया ट्रेक्टर चलाते हुए, ट्राली निकल गयी चलते ट्रेक्टर से। बड़ी चोटें आयीं। मैं मिलने गया उनको। देखा गालों की लाली में कोई हर्ज़ा नहीं था। मुझे विश्वास हो गया की वे जल्दी ठीक हो जायेंगे।

एक दिन मामाजी ने कहा, "चल पुत्तर तैनू असली चीज़ दिखायिए" और हम पहुंचे ट्यूबवेल के पास जहाँ टोका (चारा काटने वाली मशीन) लगा हुआ था। अपने निकट भविष्य से बेखबर एक मोटा ताज़ा काला बकरा मिमियां रहा था। मामाजी ने नौकर से कहा, "चल पाई, कम करिये" और नौकर ने बकरे को बाँध कर टोके पे लोड कर दिया। जयकारे के साथ बकरा शहीद कर दिया गया। मैंने घबराकर मुहं फेर लिया लेकिन मामाजी हसतें हुए मुझे खींच कर अपने पास ले आये और कहते "शेर बण"। मामाजी बकरे के मांस से खून भरी गोलियाँ निकाल कर कच्ची ही खा जाते, कहते "यही असली चीज़ है"। मैं उनके गालों की लाली का राज़ समझ गया। अफ़सोस की मुझे कभी मांस रास नहीं आया।

नारनौंद से हमेशा खुश लौटता। दोनों मामों से पैसे मिलते और घर ले जाने के लिए देसी घी और फ़ल। कई दिनों तक अपनी बहनों और पड़ोस के बच्चों पर पैसे का रौब चलता।

१९८४ दंगों के चलते, दोनों मामा पंजाब चले गए। फिर ज्यादा मिलना नहीं हुआ। लेकिन जब कभी मम्मी को देखता हूँ, तो सरदार बिशन सिंह 'शेर' की याद बरबस आ जाती है।

**क्रमश:**

2 comments:

  1. अत्यंत सहजता से लिखा गया संस्मरण जो कि इसके शीर्षक 'बचपन' को सार्थक बना देता है. भाग ३ पूर्व के दोनों भागों के सामान ही शानदार है!!

    ReplyDelete
  2. धन्यवाद, तुषार!

    ReplyDelete