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Tuesday, May 28, 2013

बचपन (भाग - IV)

जींद और रोहतक का नज़दीकी रिश्ता है। रोहतक, जींद से दिल्ली के रास्ते, लगभग आधे में पड़ता है। बड़ा शहर और जाट राजनीति का गढ़। जब पाकिस्तान से विस्थापित हुए तो ढेरों पंजाबी रोहतक और दिल्ली आकर बस गए। मेरे दादाजी, सरदार निहाल सिंह पहले दिल्ली में देव नगर (करोल बाग) में आकर बसे लेकिन अकेलेपन को न सह पाए और बिरादरी के बाकी लोगों के पास रहने के लिए रोहतक आ गए। रोहतक में ठिकाना मिला शौरी मार्किट के पास। शौरी मार्किट कपड़े की मशहूर मार्किट थी, शायद आज भी है। मुझे नए कपड़े के ख़ुशबू बहुत अच्छी लगती थी। पास ही में दुर्गियाणा मंदिर, प्रताप मोहल्ला, प्रताप टाकीज़, रेलवे रोड और भिवानी स्टैंड, जहाँ पहले भिवानी की बसें चला करती थीं, नया बस अड्डा बनने से पहले। मेरा जनम दिसम्बर की कोहरे भरी सुबह में इसी घर में हुआ था।


कुछ सालों बाद, बढ़ते परिवार के चलते, हम लोग प्रताप मोहल्ले में रहने लगे। पीले रंग का घर और मेहराबी दरवाज़ा। इसी घर में दादाजी ('पिताजी') झक सफ़ेद सलवार कमीज़ और तुर्हे वाली पगड़ी पहने 'वीर अर्जुन' पढ़ते। चाय हमेशा प्लेट में उड़ेल कर पीते। रोज़ शाम चार बजे, सज धज कर लाठी लेकर सैर को निकलते। कभी कभी में साथ हो लेता। हर दस बीस कदम पर लोग 'हेडमास्टर साहेब' को सलाम करते या चरण स्पर्श करते। रास्ते में दादाजी के मित्र काफिले में जुड़ जाते। पार्क में बैठ कर दुनिया के हाल पर शायराना तपसरा होता और पाकिस्तान की यादें ताज़ा होतीं। सब एक जैसे सफ़ेद कपड़ों में और तुर्हे वाली पगड़ी में, सिर्फ दाढ़ी से पता चलता की कौन सिख है। नाम भी एक जैसे: रामलुभाया, किशन, तिरलोचन या बिशन। सिर्फ 'लाल' या 'सिंह' के फर्क से हिन्दू और सिख कहलाते।

रोहतक वाला घर पिताजी की बदौलत हमारे वृहत 'रावल' परिवार का हेडक्वार्टर था। सभी परिवार गर्मी की छुट्टियों में रोहतक आ जाते और हम बच्चे खूब शरारतें और मस्ती करते। बड़े भाई जगजीत सिंह और सबसे छोटे चाचा सुरिंदर सिंह तब कॉलेज में पढ़ते थे। उन्हीं का जिम्मा होता था हमें भिवानी स्टैंड पर नागपाल के समोसे छोले और पंजाबी की कुल्फी खिलाने का। देर शाम जब अपनी कर्कश बांग देते हुए चना जोर गरम वाला आता तो हम सब अपनी अपनी कागज़ की कोन भरवा लेते। आखिरी में, रात को इंतज़ार करते लाल कपडे में लिपटी मलाई कुल्फी वाले की। उस्तरे नुमा चाकु से कुल्फी उतारता और केले के पत्ते पर देता। मलाई कुल्फी हमेशा कम लगती, काश की और पैसे होते! क्या पता था की बचपन के ये मज़े भी इस मलाई कुल्फी की तरह हमेश नाकाफ़ी लगेंगे।


रोहतक में हम खूब पतंगबाज़ी करते, उड़ाते कम और लूटते ज्यादा। एक से दूसरी छत लांघते और पतंग नहीं तो कम से कम मांझा लूटते। एक बार मैंने कटी पतंग का मांझा पकड़ा लेकिन पीछे से पतंग वाले ने लूट बचाने के लिए तेज़ी से मांझा खींचा। नतीजन, तर्जनी में गहरा कट और खून ही खून। आज भी उसी जगह निशान है आर सर्दियों में कुछ भी लगने से दर्द होता है। कभी कभी प्रताप टाकीज़ के दरवाज़े के बाहर से झाँक झाँक कर फिल्म देखते, या फिर, गेटमैन के डांटने पर, बाहर से ही कान लगा कर गाने सुनना और ढिशूम ढिशूम की आवाजें सुनते। बड़े भाईसाहब या सुरिंदर चाचा की मेहरबानी से कभी कभार फिल्म भी देखते और इंटरवल में बंटा लेमन पीते। अगले दिन सारे मोहल्ले को पता चल जाता की हम कौन सी पिक्चर देख कर आयें हैं। उस ज़माने में पिक्चर की सटोरी सुनाना/सुनना एक सामाजिक कार्य हुआ करता था। बकैदा फिल्म की कहानी और गानों की किताबें मिलती थीं।

गर्मी के मौसम में शौरी मार्किट के पास वाले बरफ़खाने में तरबूज़ ठंडा करके लाते। पहले तो पैसे देने पड़ते थे लेकिन जब पता चला की निहाल सिंह जी के परिवार से हैं तो मुफ्त में।

रोहतक माने दादाजी, उनका प्यार और जीवन दर्शन; दादीजी की हाथ की  बनी तंदूरी रोटियाँ, जो दो दिन बाद भी सूखती नहीं थीं; पड़ोसी के यहाँ दूरदर्शन पर सन्डे की ब्लैक एंड वाइट पिक्चर देखना (आंटी सब बच्चों को समोसे खिलाती थीं इंटरवल में); और, ट्रांजिस्टर के साथ लोफर फिल्म का गीत "ओ आज मौसम बड़ा बेइमान है" गुनगुनाना।

मैं पिताजी का प्रिय था क्यूंकि शरारतों के बावज़ूद पढ़ाई में अच्छा था। मुझसे हिंदी का अख़बार सुनते और हिसाब के सवाल पूछते। उनकी भाषा में उर्दू और फ़ारसी के शब्द होते, मसलन उनका ट्रिक क्वेश्चन "दो ज़रब  सिफ़र कितना होता है?" सही जवाब देने पर पांच पैसे मिलते। लाड़ के चलते मैं उनके हाथ के पीछे की त्वचा को ऊपर खींचता और कहता, "वेखो, तुस्सी बूढे हो गए हो हुण!"। वो हंस देते और मेरे हाथ की त्वचा खींचते और कहते, "वाह भई, तूं तां हाले जवान हैंगा।"

एक और मजेदार बात हमेशा होती रोहतक में। सब को पता था की भापाजी (मेरे डैडी का सम्मानपूर्वक संबोधन क्यूंकि वो भाइयों में सबसे बड़े थे) बहुत सख्त स्वभाव के हैं और मैं, उनका बेटा 'लवली', सबसे शरारती। मज़ाक के तौर पर सब लोग (खासकर राजपुरे वाले फूफा जी सरदार भगवान सिंह जी) मुझसे कहते की गाली निकालोगे तो पैसे मिलेंगे, छोटी गाली के पांच पैसे और बड़ी के दस! मैं कमाई करते ही घर से भागता और डैडी का गुस्सा ठंडा होने पर वापिस आता।

वृधावस्था में काफी समय दादाजी हमारे पास दिल्ली में रहे। हमेशा अपने पास बिठाते और उर्दू-फारसी में जीवनोपयोगी बातें सुनाते। मैं उनके हाथ के पीछे की कुम्हलायी त्वचा को खींचता और कहता, "वेखो, तुस्सी बूढे हो गए हो हुण"। वे हंस देते और मुझे गले से लगा लेते।      

**क्रमशः**         


      

2 comments:

  1. Dear MP. Excellent way to express feelings. We all can relive our childhood. Come on keep sharing. Regards
    Devinder Chawla

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  2. Dear MP. Excellent way to express feelings. We all can relive our childhood. Come on keep sharing. Regards
    Devinder Chawla

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