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Wednesday, June 26, 2013

Delhi Police ‘Collects’ Itself ‘For Uttarakhand’

In a move that could make a stone melt, Delhi Police have offered to donate their one day’s Hafta collections for helping out with Uttarakhand flood relief work. Delhi Police chief said in a press conference yesterday, “People think that Delhi Police is heartless, especially after the India Gate atrocities, water cannon treatments and the recent Gokulpuri beatings. But, far from it, hamare seene mein bhi dil dhadakta hai. We are also patriotic like everyone in India, Zurich and Barcelona.”




The Commissioner announced that his organization will donate one day’s Hafta collections from all state borders, Wednesday (Budh Bazar) and Saturday (Sanichar Bazar) markets and roadside vendors. On being asked why only a day’s collection has been offered and not, say, a week’s; he replied that the Uttarakhand administration is not geared up for handling that kind of money.




Every person or establishment ‘contributing’ to the Delhi Police Uttarakhand Relief Fund (DPURF) will be given a special sticker with Delhi Police logo and ‘For Uttarakhand’ or simply ‘FU’ slogan.


The commissioner further informed that their financial intervention will simplify the aid collection effort and no dubious NGOs, TV channels and political parties should to be allowed to collect money from the people. “Such calamitous times are endemic to mushrooming of fly-by-landslide operators. We must protect public confidence” he added.

All hafta collectors have been asked to wear orange blue armbands (to signify Lord Shiva) and all toll naakas will be playing Shiv bhajans to create the right atmosphere for the noble cause.      

Thursday, June 20, 2013

"मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता"

अमिताभ बच्चन बॉलीवुड के 'बिग बी' माने बिग बॉस कहे जाते हैं। टेलीविज़न पर सबसे सफल शो 'कौन बनेगा करोड़पति' एंकर करते हैं। घर बार भी दुरुस्त है। बेटी बड़े उद्योगपति के घर ब्याही है और बेटा और बहु सफल अभिनेता हैं। जनता पूजती है और धन सम्पदा की कोई कमी नहीं हैं।


आप सोचेंगे ऐसे 70-साला व्यक्ति को तो मोहमाया त्याग कर नाती-पोतों के स्नेह, पर सेवा और प्रभु भक्ति में लीन हो कर आनंदित रहना चाहिए। मैं भी यही सोचता हूँ, लेकिन कुछ समय से ये देख कर परेशान हूँ की ये व्यक्ति इतना सब कुछ होते हुए भी पैसे के पीछे क्यूँ भागता है? भागते सभी हैं, SRK भी, काजोल भी, सलमान भी, धोनी भी और सचिन भी। लेकिन अमिताभ अलग शख्शियत हैं-खानदानी, पढ़े लिखे, सुसंस्कृत- बॉलीवुड के छिछलेपन से दूर। अगर ऐसा व्यक्ति भी अगर लोगों को बालों का तेल, हाजमे की गोली, पेन और बिस्किट बेचने पर मजबूर हो जाता है तो आखिर क्यों? 



बात पैसे की नहीं हो सकती क्यूंकि 37 करोड़ का तो इस साल इनकम टैक्स भरेंगे, कमाई कम से कम तिगुनी होगी। बात सम्मान की नहीं हो सकती। लोग इतने कायल हैं की उनकी एक झलक देखते ही बेहोश हो जाते है। बात एक अभिनेता के लिए लगातार कुछ क्रिएटिव करने की या लाइमलाइट में रहने की हो सकती है, लेकिन ठंडा-ठंडा-कूल-कूल तेल बेचने में भला क्या सृजनात्मक है? तो फिर क्या ऐसी खुरक है की अपने यश को भुना कर सुबह शाम लोगों को ऐसे प्रोडक्ट खरीदने के लिए उत्साहित करें जो वे खुद शायद ही इस्तेमाल करते हों?


आप को लगता है अमिताभ बालों में नवरत्न तेल लगते होंगे? लगा कर देखें, जया जी उनसे बोलना बंद कर देंगी और अभिषेक और ऐश्वर्या घर छोड़ कर जाने की धमकी दे देंगे बिकॉज़ "देट'स सो ग्रॉस पापा!"

आप को लगता है की जीतेजी अमिताभ और अभिषेक कभी मारुती वर्सा में बैठेंगे? एक फोटो छपने की देर है और सारा बॉलीवुड (और अब होलीवुड भी) धज्जियाँ उड़ा देगा इज्ज़त की।

आप को लगता है बच्चन परिवार पार्ले की गोल्ड कूकीज खाता होगा? खाने-पीने में उनके कुत्ते भी इससे बेहतर Pedigree वाले होंगे।

यहाँ स्कूल टीचर और अभिभावक बच्चों को मैगी नूडल से बचाने में लगे हैं, वहीँ अमिताभ जी बच्चों को उकसाने में लगे हैं। खिला कर देखें आराध्या को मैगी, ऐश्वर्या से न पंगा पड़ जाये तो!  

कुल मिलकर सब धोखाधड़ी है।

तो क्यों, आखिर क्यों, एक ऐसा खुदगर्ज़ इंसान, जो कभी फेंके हुए पैसे भी नहीं उठाता, मजबूर है अपना ज़मीर बेचने को?

आपके विचार आमंत्रित हैं।



Thursday, June 13, 2013

सड़क

कहते हैं सड़के राष्ट्र की धमनियां होती हैं। आज़ादी से लेकर आज तक खूब सड़कें बनीं, टूटीं, फिर बनीं और फिट टूटीं। अगर आप राष्ट्रीय अथवा राज्य की राजधानी की पोश कालोनी या राष्ट्रीय राजमार्ग से दूर रहते हैं तो मेरा दावा है की वहां सड़के आज भी टूटी पड़ी होंगी लेकिन कहने के लिए सड़क हैं। सड़कें सड़कें नहीं, एक राजनैतिक हथियार और यातना यन्त्र बन गयी हैं। सड़कें बनी थी लोगों को करीब लाने के लिए, नतीजा आपके सामने है। जैसे जैसे सड़कें बढ़ीं वैसे वैसे लोगों के बीच की दूरियां और शहरों में उत्पादित सामाजिक और राजनैतिक ज़हर का गाँव गाँव में प्रसार बढ़ा।

आइये एक सड़क का मानचित्र बनाते हैं। सड़क है तो फैक्ट्रियां हैं तो ट्रक हैं तो देसी और विलायती के ठेके और ढाबे हैं। शहरी गाड़ियाँ गावों तक पहुँचती है और गाँव वाले सड़क के किनारे। गाँव वाले सड़क बनते ही समझ जाते हैं की 'विकास' होने वाला है। यानी, माँ (ज़मीन) की कीमत बढ़ने वाली है और दारु का ठेका नज़दीक ही लग जायेगा। शहर से आये सयाने समझाते हैं की खेतीबाड़ी छोड़ कर नेतागिरी और बिल्डर बनने में ज्यादा फ़ायदा हैं। कुछ ही दिनों में ज़मीन से खेत साफ़ और बिल्डर के इश्तिहार, रंग बिरंगे झंडे और "चौधरी प्रॉपर्टीज" का ऑफिस। ऑफिस में पूरा दिन वेलागिरी, शराब और लौंडियाबाजी। जितने शौक बढ़ते हैं, उतनी ज़मीन ग़ायब हो जाती हैं। अजीब है नां, सड़कें खेत खा जाती हैं!?

उदहारण के तौर पर, आप बहादुरगढ़ से झज्जर और चरखी दादरी की और जाएँ। ठीक ठाक सड़क है। बहादुरगढ़ से निकलते ही देहात शुरू हो जाता है। खेतों के नजारों की जगह इंजीनियरिंग कॉलेज, पब्लिक स्कूल, बिल्डरों के रंग बिरंगे झंडे, ढाबे-ठेके और सड़क के दोनों तरफ शहरी किसम की गन्दगी। जैसे दिल्ली में फैला राएता रिस रहा हो गावों में सड़क के साथ साथ। इंजीनियरिंग कॉलेज की कमर तोड़ फीस और नौकरी के नाम पर ठेंगा। बिल्डर जो मकान बनाएगा, वहां गाँव वालों की रहने की औकात कहाँ? गाँव के कुछ बच्चे DPS स्कूल में पढ़ रहे हैं लेकिन स्कूल वाले दिल्ली से बसों में भर भर कर लाये बच्चों पर ज्यादा ध्यान देते हैं। नतीजा? गाँव के बच्चे पब्लिक स्कूल की वर्दी के भीतर वही माधो के माधो।

रास्ते में गावों की मादा हालत देखें तो दिखेगा एक खण्डहर जो कभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हुआ करता था; एक कबाड़ से भरा मैदान जिसमें फुटबॉल की टूटी गोलपोस्ट तब तक खड़ी है जब तक नशेड़ियों की नज़र नहीं पड़ी, वरना 15/- किलो के हिसाब से भी कई दिन की खुराक का इंतज़ाम हो जाता; एक गंदे-सड़े पानी में डूबा कुआँ, टूटे फूटे घर, गन्दी गलियां और अधमरे बूढ़े लोग चारपाई पर पड़े हुए। जवान या तो नशेड़ी हो गए या गए फ़ौज में या दिल्ली में नौकरी के लिए धक्के खाने। खेती बाड़ी करने में किसी का भी मन नहीं लगता। सब इंतज़ार कर रहे हैं कब 'विकास' उनके गाँव तक पहुंचे और कब 'माँ' की बोली लगवाएं। सड़क तो आ ही गयी है, विकास भी आता ही होगा।

लेकिन सरकार ने सड़क बनाई है तो कुछ फायदे तो होंगे ही। मसलन  हर छोटी-बड़ी बीमारी के लिए शहर जाने के लिए सड़क; बात-बात पर बटवारे के लिए लड़ने वाले भाइयों के लिए दिल्ली में वकील के पास जाने के लिए सड़क; नेताओं के दौरों के लिए सड़क; शेहरी बाबुओं को अगले बड़े शहर ले जाने के लिए सड़क; चमचमाती गाड़ियों से फेंके गए चिप्स के खाली पैकेट और शराब की खाली बोतलों के लिए सड़क; छुटभैये नेताओं द्वारा आयोजित 'रास्तो रोको' अभियान के अंतर्गत ट्रैफिक रोकने और सरकारी गाड़ियाँ तोड़ने के लिए सड़क; बिल्डर के ब्रोचर में लिखने के लिए सड़क; राजनैतिक दमन के लिए पुलिस की गाड़ियों के आने के लिए सड़क; निकम्मे निखट्टू जवानों द्वारा लड़कियों के बलात्कार के लिए सड़क; बदमाशों द्वारा अगवा किये गए लोगों को गाँव में ले जा कर छुपाने के लिए सड़क, इत्यादि इत्यादि।
         
देखा जाए तो सब समझ का फेर है। सरकार के दृष्टिकोण से सड़क विकास का द्योतक है। शहरी लोग भी गाँव के बीच से जाती सड़क को विकास मानते हैं। 'चौधरी प्रॉपर्टी डीलर' भी सड़क को विकास मानते हैं। परंतु सड़क से कुछ कदम दूर अपने टूटे, गोबर की बदबू में सने मकान में मरणासन स्वतंत्रता सेनानी महेंदर सिंह छिकारा की मोतियाबिंद आँखों से देखा जाये तो उनके गाँव से कोई सड़क नहीं जाती। "इस्तें तो अंग्रेज इ ठीक थे" वे कहते हैं हुक्के पे बैठे साथियों को। सब सफ़ेद कुर्ते-पजामे और पगड़ी में, जैसे मातम मन रहे हों मरजानी सड़क का।   

Wednesday, June 12, 2013

A Bride for the Reluctant Prince



In India, you can remain unmarried only for two reasons: either you have some 'irreparable defect' ("पता नई बन्दे विच की नुक्स हैगा, लगदा ते चंगा पला है?") or like the Mamaji of Lapataganj, your wife routinely elopes with one of your neighbors. And, if you are a public figure or a celebrity and haven't become country's Prime Minister or at least a prime ministerial candidate, only Lord Hanumana (perhaps the only respectable bachelor ever) can save your ass from the TV channels, newspapers and the forever velas on Facebook and Twitter.


One such hapless soul is the Youth Youthful Icon of India, Rahul Gandhi. His public announcement to the effect that he'll neither marry nor become the Prime Minister has not only plunged scores of Delhi University girls into depression but also has Mommy dearest and Man Ji Uncle worried. Reportedly, Man Ji had a long chat with Rahul in the 10, Janpath kitchen and the young prince was seen emerging from the haze of aloo-pyaaz parathas saying, "जे तुस्सी प्यो बाण सगदे ओ ताँ ते कोई वि बाण सगदा है। चलो मैं सोचांगा।"

That was six months back. Unfortunately, for the dynasty and the peoples of the republics of Italy and India, the Reluctant Prince has not since shown any signs of a man willing to marry and therefore become 'normal'. The marriage of his cousin Varun has further rubbed MDH Chunky Chat Masala onto his mother's and Man Ji uncle's bruised egos. To make matters even worse, reportedly, fans of the "Youthful Icon" are miffed with celebrated author Chetan Bhagat becoming the brand ambassador of marriage portal Shaadi.com.

The ads feature Mr. Bhagat as a Youth Icon exhorting the Indian youth to get married considering the joys and benefits of married life. The Congi fans feel that in these ads allusions to the bachelor status of Rahul G. are unmistakable. While there is no use tilting at the windmills, a large number of paying members of the Rahul G. Fan Club (current membership count = 2,  some Mr. Jha and one Miss Chaturvedi) have approached the Congress President to take suitable measures to get the Youthful Icon married off. The Congress political leadership also feels that the scion should not be a bachelor for too long since confirmed bachelorhood is more of a BJP tradition.


Sociologists like Suhel Seth have argued that while faulty refrigerators (read ‘coalition allies’) and widespread corruption are ubiquitous and will equally affect BJP’s chances in 2014, the real problem for Congress is to find a cure for Rahul G.’s reluctance to take to worldly ways and appear to be a normal person. Recently, in an emergency Mini Chintan Shivir convened by the Mother Superior and attended by her troubleshooters Mr. Chidumbaram, Mr. Symbol and Mr. Rajeev Dhokla, a bullet proof plan has been arrived at to exorcise the Youth Icon’s inner demons and get him to marry like all normal Indians. The simply brilliant plan is to pitch Rahul G. for the post of the BCCI President in the ongoing melee!

While the overflowing coffers of the BCCI will come in handy during the forthcoming elections, the glitz and glamour of IPL is expected to veer the Youthful Icon away from his path of renunciation. Precautions will be taken to keep nation’s favorite son-in-law, Rober T. Vadra away from the scene lest he fills the gap created by Mr. Meiyappan. 

As an unexpected political benefit, instead of visiting poor people’s homes during the forthcoming election campaign and spoiling Congress candidates’ chances, the Youthful Icon, during the IPL matches, can instead invite one poor child from each constituency and seat them around himself (like Mata Ambani) in a special stand named after the ‘Rajeev Gandhi Brahamcharya Unmoolan Yojana’. The stand was originally to be designed by Karan Johar but the task was finally assigned to Sooraj Barjatya after KJo's recent adopt-don't-marry orientation.   

Matrimonial portals like simplymarry.com, jeevansaathi.com, bharatmatrimony.com, etc. (but not shaadi.com) will be offered high-visibility advertising spaces at highly subsidized rates. Cheerleaders, specially trained by Sooraj Barjatya will perform seductive dances set to songs like Banno Rani, Mehndi Laga ke Rakhna, Saajan Ji Ghar Aaye, etc. in front of the RG-BUY stand.


Glamorous on-the-ground presenters like Karishma Ko Taak and Rochelle Idhar Aao, and Bollywood starlets will be specially instructed to chat with the Youth Icon during the match and in the famous IPL post-match parties. 

The I&B ministry also plans to liberally distribute special placards inside the IPL arenas carrying a picture of the Youthful Icon and the slogan “RAHUL MARRY ME!!!” 




Tuesday, June 11, 2013

'Customer' नहीं, 'कष्टमर' बोलिए! वाह Airtel !!

I am a Platinum Service (for office Fixed Line) as well as a Gold Service (mobile and fixed line connection at home) customer of Airtel. Platinum AND Gold! Wow!! You must be thinking of the privileges I must be enjoying, no? Come, let me tell you a story.

Our house in Pitampura area gets either poor indoor mobile coverage or none at all. We must walk out to the front balcony or cling to the metal jaali that surrounds the rear verandah to take mobile calls. And, then there is a social cost to pay in the form of "Yaar, you do not pick my calls! Naraaz ho ya attitude hai?" I wish I could send this image to them every time they accused me of insolence! 



Most of us also use mobile phone and email for interacting with most service providers like banks, utilities, fixed line phone (yes) and online shopping. This means that if you are having trouble with your mobile phone service or internet access, life can become difficult, and poor customer care worsens the experience. The Airtel fixed line and broadband experience has improved of late and the company that handles field work must be commended for good response time and simple but effective method of problem resolution. Their mobile phone service, due to endemic problems related to radio coverage and mobile data billing, however remains flaky.

In September 2012, after the Revised National Radiation Standards were issued, the government had clamped down on the mobile equipment and tower companies and asked them to bring down the transmitted radio power to within the new permissible limits. As a result, most parts of Delhi (and surely, other cities too) that are located even 300m away from a BTS have been suffering from poor mobile coverage ever since. The solution was/is to install more cell sites (BTSs) but network providers like Ericsson and operators like Airtel don't want to do it because cell sites are expensive and therefore not salubrious to their profitability.

As is common knowledge, all mobile companies have outsourced their equipment plants and billing to the likes of Ericsson, Nokia Siemens and IBM, and customer care to Serco and others. Problem with companies like Serco is that they engage low cost contractors to handle their work, including field support and call centers. Effectively, the direct customer interfacing is handled by lowly paid technicians and run-down call centers. This is a recipe for disaster. And, this story is a dish prepared according to this recipe.


After my patience ran out with Airtel's poor mobile coverage, I lodged a complaint with '198' desk many months ago but nothing improved. Interestingly, per Airtel (or whoever was masquerading as Airtel), the problem had been resolved to my satisfaction! Who says Airtel is not good at giving us 'Matrix' and 'Inception' like experiences!

Now, in the last week of May 2013, I reopened the issue with Airtel Customer Care via their @Airtel_presence handle on Twitter. Fancy, isn't it? Below is the chronology of my interaction with them. The purpose of this blog post is to expose the total disconnect among various units that comprise Airtel's Customer Care. (Story updated after every significant event.)

1. Last week of May 2013 (via Twitter): @Airtel_presence (https://twitter.com/Airtel_Presence ) alerted of the issue. They acknowledged on the same day.

2. June 9, 2013: Call from Customer Care.

Caller, "सर, आपने मोबाइल की कंप्लेंट की थी?"
Me, "हाँ की थी"
Caller, "क्या प्रॉब्लम है सर?"
Me, "क्यों, आपको मालूम नहीं है?"
Caller, "नहीं सर"
Me, "तो पहले प्रॉब्लम पता करो"
Caller, "ओके, थैंक्यू सर?"

3. June 10, 2013: Call from Customer Care.

Caller, "सर, आपने मोबाइल की कंप्लेंट की थी?"
Me, "हाँ की थी"
Caller, "Resolve हो गयी सर?"
Me, "नहीं! By the way, आपने एक्शन क्या लिया है?"
Caller, "पता नहीं, सर"
Me, "तुम कॉल सेंटर से बोल रहे हो या एयरटेल से?"
Caller, "कॉल सेंटर से सर"
Me, "मुझे आप से कोई बात नहीं करनी। किसी ऐसे बन्दे से बात करवाओ जिसे इशू पता हो और जो कुछ काम करता हो सिर्फ फ़ोन पर बातें नहीं!"
Caller, "ओके, थैंक्यू सर?"

4. June 10, 2013: Another call from Customer Care.

Caller, "सर, आपकी कवरेज रिलेटेड कंप्लेंट थी"
Me, "हाँ"
Caller, "सर, किस तरह की प्रॉब्लम आ रही है?"
Me, "कवरेज नहीं है किसी भी रूम में नहीं और क्या बताऊँ? कमाल है, दो हफ्ते हो गए और तुम अभी पूछ रहे हो की प्रॉब्लम क्या है? By the way, आपने कोई एक्शन लिया है अभी तक?"
Caller, "पता नहीं, सर"
Me, "प्लीज आप एक्शन लीजिये और बातें कम कीजिये (+ हिंदी और अंग्रेजी में गालियों का मिश्रण)"
Caller, "ओके, थैंक्यू सर?"

[Life_Lesson_from_Airtel #328: "Being abusive with Customer Care folks works." However, I would rather not like it to be like this. :-( ]

5. June 11, 2013: Call from Irfan Masood of Ericsson (Gurgaon)

Caller, "सर, आपकी कवरेज रिलेटेड कंप्लेंट थी. मैं एयरटेल से बोल रहा हूँ"
Me, "तुम्हारा नाम क्या है?"
Caller, "इरफ़ान सर?"
Me, "पूरा नाम?"
Caller, "इरफ़ान मसूद, सर"
Me, "एयरटेल से हो या कॉल सेंटर से?"
Irfan, "सर, दरअसल मैं Ericsson गुड़गाँव से हूँ, नेटवर्क ऑप्टिमाइजेशन ग्रुप से"
Me, "बताइए कैसे हेल्प कर सकता हूँ?"
Irfan, "सर, अपना एड्रेस बताएँगे ?"
Me, "क्यों तुम्हें बताया नहीं गया?"
Irfan, "सर, क्या आपका एड्रेस ------ है? कन्फर्म कर दीजिये"
Me, "आप मेरे घर पहुँच कर मुझ से कन्फर्म कीजिये, अपने घर पर बैठ कर नहीं!"
Irfan, "ओके सर"

Irfan reaches my house in about an hour and takes radio coverage observations on the ground and first floors.

Irfan, "मैंने मेजेरमेंट्स ले लीं हैं, pathetic कवरेज है सर, सबसे नज़दीक BTS 400m दूर है!"
Me, "सलूशन क्या है?"
Irfan, "सर मैंने, अपने सीनियर्स हरीश चंद्रा से डिसकस किया है। दो सलूशन हो सकते हैं, आपकी छत पर एक छोटा BTS लग सकता है या फिर बूस्टर"
Me, "BTS लगाने में तो सिविल वर्क involved होगा, कौन लगाने देगा?"
Irfan, "आपकी बात ठीक है सर, लेकिन बूस्टर लगाना हमारी डिपार्टमेंट के हाथ में नहीं हैं!"
Me, "जिसके हाथ में हैं, उसे जा कर बताओ"
इरफ़ान, "ओके सर?"

6. June 11, 2013 (Evening): Call from Sonia Wadhwa of @Airtel_Presence. She is part of the Airtel social media team. After offering the customary apologies and suffering the barrage of my angry tirade, she takes down details of all Airtel numbers my family is using, ostensibly because "हमें स्ट्रोंग केस बनाने में हेल्प मिल जाएगी"

7. June 18, 2013: No action since last one week. Just the same stupid call today:
Caller, "सर, आपने मोबाइल की कंप्लेंट की थी?"
Me, "हाँ की थी"
Caller, "Resolve हो गयी सर?"
Me, "नहीं! By the way, आपने एक्शन क्या लिया है?"
Caller, "पता नहीं, सर"

8. July 4, 2013: Received an email from one Rajan Gupta of @Airtel_Presence. The message is self-contradictory. On one hand, they defend that there is adequate indoor coverage and, on the other, say that they have "noted my address for future planning purpose". According to them, coverage may not be good "deep indoors and in basement". Well, my house does NOT have a basement and coverage is 'pathetic' all over the house as noted by their engineer Irfan Masood on June 11.

My reply to Rajan Gupta (July 4):

"Dear Mr. Rajan Gupta,

1. My home does NOT have a basement. And, I hope, you do not consider every room inside the house as 'deep indoor'. The signal is 'pathetic' all around the house as your engineer Mr. Irfan has measured. Your assertion "confirmed the availability of adequate indoor network coverage at the problematic area" is wrong.
2. I am engineer myself and avoid giving me gyan on atmospheric conditions and topology. The problem is simple: your nearest BTS is unable to provide indoor coverage in the area.
3. You will do well do take concrete action and stop fooling yourself and customers. As a next step, I am planning to report the matter to the Consumer Court since it has been a long time of hearing just words from you and no action."  

(Last updated on: 4 July 2013)

***क्रमश:***

Monday, June 10, 2013

Book Review:“Amreekandesi - Masters of America” by Atulya Mahajan, Random House India, 2013.

My rating: ●●●½

“Amreekandesi - Masters of America” by Atulya Mahajan, Paperback, 310 pages, Ebury Press, Random House India, 2013, Rs 199/-.




Atulya Mahajan’s debut novel “Amreekandesi” is the story of two Indian engineering graduates, Akhil and Jassi, who set out to the US (Florida) for their Masters degree in computer science (therefore the subtitle “Masters of America”). As persons, Akhil and Jass (or “Jazz”, as he prefers to be called) are poles part but their dream of changing their lives for the better unites them and takes them from their harried middle-class existence to the Promised Land. While Akhil dreams of coming back to India after his MS and thus return to his roots, Jazz would rather stay put in his dreamland, bidding good riddance to bad shit forever. The novel is a saga of their struggle to get into Amreeka, coming to terms with the American way of life, finding (and losing and finding again) love and lust; and, may be, even a wife.      

I approached the book with lot of trepidation as the subject seemed jaded and my experience with Indian English fiction has not been very satisfying of late. The book kept on lying around the house and silently sulked until I finished my current read, a much awarded work of fiction by a Swedish author. Finally, “Amreekandesi” found a place in my car, where I do most of my reading during long commutes between Delhi and Gurgaon.

“Amreekan Desi” is a breezy read that keeps you engaged, despite the oft-repeated subject. The author deals with an ordinary subject with sincerity. The first thing that impresses is author’s choice of the two main characters, of which one (Akhil?), I suspect, is styled on the author himself. Akhil and Jassi are your everyday North Indian students with Stars and Stripes in their eyes, who must live their Amreekan dream to wash away all sins that accrue from studying in a not-so-good-college or belonging to a not-so-well-off family. They are so easy to identify with. Next is author’s nuanced eye. He nicely captures the minor details of various characters’ personal quirks and situations thereby imparting authenticity to the proceedings. Less than half way through the novel and you begin wishing that Jassi stops tumbling from one amorous misadventure to the next and finally finds succor in Pamela Anderson’s cleavage; and, Akhil and Nandita’s fledgling love meets a happy ending.

Like a Bollywood film, after the interval, the story powers ahead on steroids and after a bevy of heartbreaks and lucky escapes, the jigsaws of the various actors’ lives finally fall into place. Akhil’s visit to Nandita’s parents in Kolkata is quite ‘filmy’ but endearing and ups the emotional quotient of the story. The laughs are not big; rather, you will chuckle your way through the book.   

For me, the test of a good book is how many characters or situations from the book stay with you. Akhil, Jassi, Nandita, Priyank, Kedar, Dilpreet, Brad and Victoria manage to do just that.

Atulya Mahajan (aka @amreekandesi) graduates with honors with “Amreekandesi”. Let us wait for his Masters degree now.