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Thursday, June 13, 2013

सड़क

कहते हैं सड़के राष्ट्र की धमनियां होती हैं। आज़ादी से लेकर आज तक खूब सड़कें बनीं, टूटीं, फिर बनीं और फिट टूटीं। अगर आप राष्ट्रीय अथवा राज्य की राजधानी की पोश कालोनी या राष्ट्रीय राजमार्ग से दूर रहते हैं तो मेरा दावा है की वहां सड़के आज भी टूटी पड़ी होंगी लेकिन कहने के लिए सड़क हैं। सड़कें सड़कें नहीं, एक राजनैतिक हथियार और यातना यन्त्र बन गयी हैं। सड़कें बनी थी लोगों को करीब लाने के लिए, नतीजा आपके सामने है। जैसे जैसे सड़कें बढ़ीं वैसे वैसे लोगों के बीच की दूरियां और शहरों में उत्पादित सामाजिक और राजनैतिक ज़हर का गाँव गाँव में प्रसार बढ़ा।

आइये एक सड़क का मानचित्र बनाते हैं। सड़क है तो फैक्ट्रियां हैं तो ट्रक हैं तो देसी और विलायती के ठेके और ढाबे हैं। शहरी गाड़ियाँ गावों तक पहुँचती है और गाँव वाले सड़क के किनारे। गाँव वाले सड़क बनते ही समझ जाते हैं की 'विकास' होने वाला है। यानी, माँ (ज़मीन) की कीमत बढ़ने वाली है और दारु का ठेका नज़दीक ही लग जायेगा। शहर से आये सयाने समझाते हैं की खेतीबाड़ी छोड़ कर नेतागिरी और बिल्डर बनने में ज्यादा फ़ायदा हैं। कुछ ही दिनों में ज़मीन से खेत साफ़ और बिल्डर के इश्तिहार, रंग बिरंगे झंडे और "चौधरी प्रॉपर्टीज" का ऑफिस। ऑफिस में पूरा दिन वेलागिरी, शराब और लौंडियाबाजी। जितने शौक बढ़ते हैं, उतनी ज़मीन ग़ायब हो जाती हैं। अजीब है नां, सड़कें खेत खा जाती हैं!?

उदहारण के तौर पर, आप बहादुरगढ़ से झज्जर और चरखी दादरी की और जाएँ। ठीक ठाक सड़क है। बहादुरगढ़ से निकलते ही देहात शुरू हो जाता है। खेतों के नजारों की जगह इंजीनियरिंग कॉलेज, पब्लिक स्कूल, बिल्डरों के रंग बिरंगे झंडे, ढाबे-ठेके और सड़क के दोनों तरफ शहरी किसम की गन्दगी। जैसे दिल्ली में फैला राएता रिस रहा हो गावों में सड़क के साथ साथ। इंजीनियरिंग कॉलेज की कमर तोड़ फीस और नौकरी के नाम पर ठेंगा। बिल्डर जो मकान बनाएगा, वहां गाँव वालों की रहने की औकात कहाँ? गाँव के कुछ बच्चे DPS स्कूल में पढ़ रहे हैं लेकिन स्कूल वाले दिल्ली से बसों में भर भर कर लाये बच्चों पर ज्यादा ध्यान देते हैं। नतीजा? गाँव के बच्चे पब्लिक स्कूल की वर्दी के भीतर वही माधो के माधो।

रास्ते में गावों की मादा हालत देखें तो दिखेगा एक खण्डहर जो कभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हुआ करता था; एक कबाड़ से भरा मैदान जिसमें फुटबॉल की टूटी गोलपोस्ट तब तक खड़ी है जब तक नशेड़ियों की नज़र नहीं पड़ी, वरना 15/- किलो के हिसाब से भी कई दिन की खुराक का इंतज़ाम हो जाता; एक गंदे-सड़े पानी में डूबा कुआँ, टूटे फूटे घर, गन्दी गलियां और अधमरे बूढ़े लोग चारपाई पर पड़े हुए। जवान या तो नशेड़ी हो गए या गए फ़ौज में या दिल्ली में नौकरी के लिए धक्के खाने। खेती बाड़ी करने में किसी का भी मन नहीं लगता। सब इंतज़ार कर रहे हैं कब 'विकास' उनके गाँव तक पहुंचे और कब 'माँ' की बोली लगवाएं। सड़क तो आ ही गयी है, विकास भी आता ही होगा।

लेकिन सरकार ने सड़क बनाई है तो कुछ फायदे तो होंगे ही। मसलन  हर छोटी-बड़ी बीमारी के लिए शहर जाने के लिए सड़क; बात-बात पर बटवारे के लिए लड़ने वाले भाइयों के लिए दिल्ली में वकील के पास जाने के लिए सड़क; नेताओं के दौरों के लिए सड़क; शेहरी बाबुओं को अगले बड़े शहर ले जाने के लिए सड़क; चमचमाती गाड़ियों से फेंके गए चिप्स के खाली पैकेट और शराब की खाली बोतलों के लिए सड़क; छुटभैये नेताओं द्वारा आयोजित 'रास्तो रोको' अभियान के अंतर्गत ट्रैफिक रोकने और सरकारी गाड़ियाँ तोड़ने के लिए सड़क; बिल्डर के ब्रोचर में लिखने के लिए सड़क; राजनैतिक दमन के लिए पुलिस की गाड़ियों के आने के लिए सड़क; निकम्मे निखट्टू जवानों द्वारा लड़कियों के बलात्कार के लिए सड़क; बदमाशों द्वारा अगवा किये गए लोगों को गाँव में ले जा कर छुपाने के लिए सड़क, इत्यादि इत्यादि।
         
देखा जाए तो सब समझ का फेर है। सरकार के दृष्टिकोण से सड़क विकास का द्योतक है। शहरी लोग भी गाँव के बीच से जाती सड़क को विकास मानते हैं। 'चौधरी प्रॉपर्टी डीलर' भी सड़क को विकास मानते हैं। परंतु सड़क से कुछ कदम दूर अपने टूटे, गोबर की बदबू में सने मकान में मरणासन स्वतंत्रता सेनानी महेंदर सिंह छिकारा की मोतियाबिंद आँखों से देखा जाये तो उनके गाँव से कोई सड़क नहीं जाती। "इस्तें तो अंग्रेज इ ठीक थे" वे कहते हैं हुक्के पे बैठे साथियों को। सब सफ़ेद कुर्ते-पजामे और पगड़ी में, जैसे मातम मन रहे हों मरजानी सड़क का।   

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