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Sunday, December 29, 2013

नीचे उतर घुड़सवार!

अरविन्द केजरीवाल को मुख्य मंत्री बने दो दिन भी नहीं हुए कि बीमार पड़ गए। चुटकी लेने वालों कि मौज हो गयी, चाहे अधमरे कांग्रेसी हो या नामो भक्त।  "देखा! ज़िम्मेदारी निभाना अलग चीज़ है और चुनावी वायदे करना अलग!" से लेकर "हर शख्स मोदी नहीं होता!" इत्यादि।

अरविन्द कि टीम के सभी साथी रामलीला मैदान से सीधे अपने-अपने विभागों के कामों में जुट गए।  कहीं बाबुओं कि खोज ख़बर, तो कहीं जनसम्पर्क। सन्डे सुबह मैं भी एक मंत्री के साथ रहा कुछ समय। लोगों का उत्साह देखते ही बन रहा था, इतनी उम्मीदें, इतने सुझाव और ढेरों वालंटियर। ऐसे दृश्य पिछले चार दशकों में तो कभी नहीं दिखे। राजनैतिक बदलाव ही नहीं, फ़िज़ा ही नयी है। उपरवाले कि भी मर्ज़ी लगती है, वरना जो पिछले एक दो वर्षों में हुआ, वो किसी ईश्वरीय शक्ति के बिना सम्भव नहीं हो सकता।



काम का पहाड़ खड़ा है। हर विभाग, तमाम प्रणालियाँ और ज़्यादातर करमचारीयों और अफसरों कि कमर भ्रष्टाचार ने तोड़ रक्खी है। 'राग दरबारी' सा माहौल है। उसके ऊपर अपेक्षाओं का अम्बार। जनता-जनार्दन कि तो ठीक, BJP के समर्थकों और आर्मचेयर दार्शनिकों के क्या कहने। जो काम कांग्रेस और बीजेपी ४० सालों में न कर सके, वो आम आदमी पार्टी और केजरीवाल, चार दिनों में नहीं तो कमसकम चार महीनें में तो कर ही दें। पढ़े-लिखे मित्र पिले पड़े हैं फेसबुक और ट्विटर पर, कोई बीजेपी के वियोग में चूड़िया तोड़ रहा है तो कोई दिन गिन रहा है कि कब AAP कि सरकार सरके और कब किसी और राज्य के मुख्यमंत्री कि उपलब्धियां गिनवा कर दिल्ली में चुनाव जीतें। अजीब दृष्टिकोण है -- जिन दलों के पिछले ४०-५० सालों के कुशाषन का नतीजा देश भुगत रहा है, उसी कि वापसी कि दुहाई मांग रहे हैं?!

एक नयी सोच के लिए अपने मौजूदा वैचारिक बहाव को रोक संतुलित विश्लेषण करना पड़ता है। नौजवान थोड़ा जल्दी कर लेते हैं, और निठल्ले दार्शनिक  थोड़ी देर से। AAP कि विचारधारा और कार्यशैली का मूलमंत्र हैं 'Volunteership', यानि, निस्वार्थ सेवा, बिल्कुल जैसे हम सब मंदिरों और गुरुद्वारों में करते हैं। लिहाज़ा ये ग्लैमरस नहीं हैं और वैचारिक सादगी कि हमें आदत नहीं है। गए शुक्रवार को दफ्तर में एक इंजीनियर ने मुझसे कहा, "सर, जितवा तो दिया, अब आपके केजरीवाल कुछ काम भी करेंगे या नहीं?" मैंने उसे पकड़ा और कहा, "भाई, सबसे पहले तुम चौधराहट कि आरामकुर्सी से उतर वालंटियर बनों और सुधारकार्यों में कन्धा लगाओ। अपने घर-कालोनी के आसपास सफाई, चिकित्सा सुविधाओं, कानून व्यवस्था को सुधारने और भ्रष्टजनों को तारने में सहयोग करो। केजरीवाल ने कहा है कि हर दिल्ली वाला मुख्यमंत्री है। छाती फाड़ कर खड़े हो जाओ भ्रष्ट और निक्कमें बाबुओं और करमचारियों के सामने और अपने काम करवाओ।  हाँ, अगर कोई ईमानदार और कर्मठ हीरा मिले तो शाबाशी देना मत भूलना। वो रीढ़ कि हड्डी है आम आदमी कि सरकार की।" इंजीनियर बेचारा "बट सर...बट सर..." करते करते समझ गया कि आधा खाली गिलास, आधा भरा कैसे बनता है।        

कहीं आप भी किसी बड़ी राजनैतिक विचारशैली के घोड़े पर सवार तो नहीं? आइये, हाथ थामिये हम पैदल सवारों का और उतरिये भारत माँ कि लिए कर्मभूमि पर।

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

जय हिन्द! वंदे मातरम!!  

1 comment:

  1. Excellent post sirji, Captured today's political scenario in an excellent way. :)

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